रविवार, 22 अप्रैल 2012

ओ! धरती



















ओ! धरती
(महाकवि जयशंकर प्रसाद के स्मरण में)

1.

त्रिकुटी को कुतरता है कीड़ा
हथेलिओं से रेंगता हुआ धीरे-धीरे चढ़ आया है ऊपर
शिराओं में छोड़ता हुआ विष

चेहरे को ढंक लेती है कालिमा
पलकों पर लद गई हैं आँखें, उनके भार से कांपते हैं पैर

पृथ्वी की अँधेरी सुनसान रेत पर गिरती हैं रौशनियाँ उल्कापात की तरह

सुबह के स्वागत में एक भी हरी पत्ती नहीं
कहीं कोई बीज नही भविष्य का
अंकुरण के मुहाने धुंए से अटे पड़े हैं.

२.

बोझिल पलकों पर टप-टप बजता है जल
जो जलकुम्भी के अंदर
बाहर के पानी से डरकर छिपा था

रेत पर जर्जर पीपल का एक पत्ता अपनी थकी शिराओं से पीता है उसे
उसके होंठ ज़रा हिले हैं

पत्ता खोजेगा अपने लिए एक टहनी
टहनी को चाहिए तना
मुझे लानी है गहरी धंसी हुई जड़े

रेत से एक आवाज़ आई है कोंपल की
उसके रक्ताभ होंठो पर सूरज की उजली किरण है.

  
.

मछलियाँ तट से उचक-उचक देखती हैं
पिघलते पहाड को
वह पूरा का पूरा समा जायेगा जल में

जल से जल तक की उसकी यात्रा में जल ही बचेगा
उस जल की अंजुरी से छलांग लगाकर बाहर आ गई है वह रंगीन शल्क वाली मछली

जल का सूखा कण धीरे-धीरे आर्द्र होता है आक्सीजन से
मछली के गलफड़े हिलते हैं धीरे-धीरे

४.

धरती पर पहले बारिश की चिकनाहट है
उसने अपनी काया पर लपेट ली है बादलों की नज़र
सूरज डूब रहा है उसके तारुण्य में

धवल बादल थोड़ा ओट होते ही
धरती की देह पर धारदार बरस रहे हैं
भिंगोते हुए उसके उतुंग पहाड़
भर गए हैं उसकी घाटी में

हरे पत्तों से ढक लेती है वह अपना अधखुला अंग

चन्द्रमा सूरज की किरणों के जाल में घिरा
चाहकर भी अपने दाग नहीं छिपा पाता
अपनी चमक में खुद ही उसका गिरते जाना
धरती ने देखा है

५.

चन्द्रमा  परिश्रम से थकी पृथ्वी को
निर्वस्त्र कर देता है पूर्णिमा तक आते-आते
वह बादलों को पार करके उतर आया है
धरती के तन पर

६.

चन्द्रमा के सपने के बाहर
सुबह की खिली हुई धूप में धरती सुनहरी है
पक्षिओं का गान उसके कंठ के घाव को धीरे धीरे भर रहे हैं
पशुओं के देह पर उग आए हैं रोम
हाथिओं के दांत बढ़ रहे हैं बेखौफ

बहुत दिनों के बाद लौटा है गिद्ध

कौए अपने काले पंख देखकर खुश हैं
अभयारण्य से बाहर शेर की दहाड से धरती खुश है

बंदरों के लिए कोई भी जगह निषिद्ध नहीं
मछलियाँ उछलती और गिर पड़ती हैं पानी में
उनके छपाक-छपाक के बीच कहीं कोई जाल या कांटा नहीं

चूजे अपनी पूरी उम्र पाने की उम्मीद में
इधर उधर फुदक रहे हैं

धरती खिली, खुली, भरी सी घूम रही है qअपनी धुरी पर.
सूरज और चाँद से एक निश्चित दूरी पर.
  

_____________________________________ 
 पेंटिग : Salvador-Dali 

शनिवार, 4 फरवरी 2012

एकांत






















पेंटिग : साद कुरैशी 



एकांत


पहाड़ों की वह हरे रंग वाली सुबह थी
हिलता गाढ़ा रंग और उस पर चमकती हुई फिसलन
घाटी में सूरज गेंद की तरह लुढक रहा था
घास के गुच्छे में उसकी किरणें उलझ जातीं
विराट मौन का उजाला फैल रहा था घाटी में

इस मौन में आज उसे पता चला अपनी पदचापों का
पलकों के गिरने की भी अपनी लय होती है
श्वासों के चढने का अपना संगीत

अकेला होना असहाय होना नहीं होता हमेशा
यहीं से फूटती है अपनी लघुता को देखने की वह पगडंडी
जिधर अब कोई कम ही निकलता है 

उसकी देह तेजाब में भीगते – भीगते और तेज़ रौशनियों में जलते जलते
कुछ इस तरह हो गई थी कि
उसे जब तक जल में भिगोया न जाए वह अकडी रहती 

जब उसने पुकारा जल
एक शालीन धार अपनी शीतलता के साथ एक सोते से
फूट पड़ी

जल के इस आगमन पर
उसने श्लोक की तरह कुछ उच्चरित किया
प्रार्थना के संबल से भर गईं उसकी आँखें

देह ने अपने जल से जैसे इस जल का अभिषेक किया हो

इस निर्मलता के सामने
उसने अपने को कांपते हुए देखा.





सोमवार, 12 दिसम्बर 2011

हत्या

























हत्या

उसकी हत्या हुई थी. सड़क से गाँव के रास्ते का एक हिस्सा सुनसान था. खेतों से होकर गुजरता था. वही से वह गायब हुई. वही गन्ने के खेत के पीछे उसका शव मिला, कई दिनों बाद. चेहरा झुलसा हुआ. कपड़ो से पहचानी गई.

पिता ने ज़ोर देकर कहा कपड़ो से पता चलता है उसके साथ दुष्कर्म नहीं हुआ है. लड़की ने मरते मरते भी कुटुंब की लाज़ बचाई.

कहीं बाहर नौकरी करता भाई आया था. चेहरे पर थकान. जैसे किसी झंझट में पड़ गया हो.

घर के लोग अब जो हो गया सो गया का भाव लिए कुछ आगे करने के बारे में संशय में थे.     एक पड़ोसी ने यह भी कहा कि क्या जरूरत थी जवान लड़की को पढाने की.

वह सिपाही बनना चाहती थी. कोचिंग करने समीप के नगर में जाती थी. अन्त समय उसने मोबाईल से जिनसे बातें की वे भी उसके मौसरे भाई, चचेरे भाई थे. ऐसा उस लड़की की  जाति-बिरादरी के लोग कह रहे थे. बार-बार



अगर लड़की किसी के प्रेम में होती और तब उसकी हत्या होती तो इसे स्वाभाविक माना जाता, उसके इस स्वेछाचार का अन्त यही होना था, इसी किस्म से कुछ कहा जाता. और कुटुंब के लिए यह बदनामी की बात होती.

उसकी बस हत्या हुई थी. उसका किसी से प्रेम या शारीरिक सम्बन्ध नहीं था. यही राहत की बात थी.

एक लड़की जो स्त्रीत्व की ओर बढ़ रही थी
इसी के कारण मार दी गई

उसके लंबे घने काले केश जो इसी दुनिया के लिए थे

उसका चमकता चेहरा
जिसकी रौशनी में कोई न कोई अपना दिल जलाता

वह एक उम्मीद थी
उसे अपना भी जीवन देखना था

अगर वह प्रेम में होती, बिनब्याही माँ बनने वाली होती, उसके बहुत से प्रेमी होते
या वह एक बेवफा महबूब होती
तो क्या उसकी हत्या हो जानी चाहिए थी

क्या अब हम हत्या और हत्या में भी फर्क करेंगे.







शुक्रवार, 11 नवम्बर 2011

मधुमास





















मधुमास

इतवार कब फिसल गया पता ही नहीं चला

थक कर लौटती हो तुम
टूट कर गिरा रहता हूँ मैं

कभी प्याली तुम पकड़ाती हो
कभी चाय मैं बनाता हूँ
हम दोनों मिलकर भी कई बार नहीं बना पाते रात का खाना
जाले कौन हटाए यह एक और उलझा हुआ सवाल है

गमले का पौधा पहले मुरझाया फिर रविवार आने से पहले ही
गिर कर सूख गया
उसका शव मिट्टी बना
इस मिट्टी में रोपना है फूल 
करता  हूँ  इंतज़ार फिर किसी छुट्टी का 

सूरज को देखे बरसों बीत गए
चाँद दिखता है धुंधला
किसी दिन जब हम आफिस जाने की जल्दी में थे
खिड़की से गौरया ने खटखटा कर दी थी आवाज़
हडबडी में हम छोड़ आए चलता पंखा
शाम उसके पंख बिखरे मिले घर में खून से लथपथ
अब हमारी खिड़की बंद रहती है

बसन्त
पहिओं से  घिसटता हुआ आता है हमारे शहर में
तुम्हारी खुशबू में लिपटा चला आता है धुंआं
मेरे कपड़ों से रेत की तरह गिरते हैं
मेरे छोटे-बड़े समझौते

तुम्हारी लिपस्टिक से उतरती हैं दिन भर की फीकी मुस्कराहटे
तुम्हारा मोबाईल तुम्हारी हंसी को बदल देता है  
यस सर में
मेरा लैपटाप खींच ले जाता है मुझे तुमसे दूर
अपनी आफिस टेबल पर

अगले दिन शाम ढले फिर तुम झुकी हुई आती हो
रात गए मैं बुझा सा तुमसे मिलता हूँ

हमारे बीच 
न स्नेहिल स्पर्श है, न कातर चुम्बन. न आतुर रातें

शायद वीर्य और रज भी हमारी किश्तों के भेट चढ़ गए.



बृहस्पतिवार, 20 अक्तूबर 2011

सिरहाने मीर के


















सिरहाने मीर के


लाल किले के परकोटे
और जामा मस्जिद की सीढियों से दूर
महबूब के दीवार के साए तले
टुक रोते रोते सो गया है  मीर
टूटे दिल और खुले चेहरे वाला वह शायर

जिसकी आवाज़  अब भी भग्न महलों में गूंजती रहती है
जिसमें हिंदुस्तान की दूर तक पसरी धरती का ताबाइं रंग है
जहां गौरया फुदकती है
मोर नाचते हैं
और आम रस से भरकर टपक जाते हैं

यह वही सूफी है जिसके विरह के ताप से टूट कर गिर पड़ी थी कभी पूरी की पूरी शताब्दी
इतिहास के बाहर जिसका मलबा आज भी पसरा है
जहां से  रह-रह  दुरार्नियों के लश्कर के लौटते घोड़ों के टापों की आवाज़े आती हैं
उजाड बस्तियों में दरवेश की तरह भटकती रहती है कोई पुकार 

हर ईंट की ज़बान पर दुःख भरा एक किस्सा है
क्या पता ..
समय का, सल्तनत का कि खुद शायर का 

कसका खींचे उसे कितनी ही बार देवालय में देखा गया था
काबे और कैलास का रास्ता
तब इतना जुदा नही दिखता
अगर कोई दिल के रास्ते चले
काबे का रास्ता कैलास से जा मिलता था

उसके शेरों ने अपनी नाजुक अंगुलिओं से जो सवाल उठाये
उसकी चोट से निरुत्तर हो जाते थे कई बार शेख ओ ब्रहम्न

जिस  कवि के लिए पेड़ के साए का बोझ भी कई बार असहय हो जाता 
उसकी ज़बान ने अपने लिए ऐसे शब्द चुने जो अब्र की तरह
अर्थ की बंजर धरती पर बरस जाते थे


वह भाषा जो सिंधु को पार करके खुद एक नदी थी
उस भाषा को भी क्या इल्म
कि कभी उसके भी दो हिस्से होंगे

अल्फाज़ कहीं
मायने कहीं और.












मंगलवार, 6 सितम्बर 2011

पत्नी के लिए



















पत्नी के लिए

वह आंच नहीं हमारे बीच
जो झुलसा देती है
वह आवेग भी नही जो कुछ और नहीं देखता
तुम्हारा प्रेम जलधार जैसा   

तुम्हारा प्रेम बरसता है
और कमाल की जैसे खिली हो धूप

तुम्हारा घर
प्रेम के साथ-साथ थोड़ी दुनियावी जिम्मेदारिओं से बना है
कभी आंटे का खाली कनस्तर बज जाता है
तो कभी बिटिया के इम्तहान का  रिपोर्ट कार्ड बांचने बैठ जाती हो

तुम्हारे आंचल से कच्चे दूध की गंध आती है
तुम्हारे भरे स्तनों पर तुम्हारे शिशु के गुलाबी होंठ हैं
अगाध तृप्ति से भर गया है उसका चेहरा
मुझे देखता पाकर आंचल से उसे ढँक लेती हो
और कहती हो नज़र लग जाएगी
शायद तुमने पहचान लिया है मेरी ईर्ष्या को  

बहुत कुछ देखते हुए भी नहीं देखती तुम
तुम्हारे सहेजने से है यह सहज

तुम्हारे प्रेम से ही हूँ इस लायक कि कर सकूँ प्रेम

कई बार तुम हो जाती हो अदृश्य जब
भटकता हूँ किसी और स्त्री की कामना में
हिस्र पशुओं से भरे वन में

लौट कर जब आता हूँ तुम्हारे पास
तुम में ही मिलती ही वह स्त्री
अचरज से भर उसके नाम से तुम्हें पुकारता हूँ

तुम विहंसती हो और कहती हो यह क्या नाम रखा तुमने मेरा.










'पत्नी के लिए’ कविता को लेकर फेसबुक के ग्रुप ‘कविओं की पृथ्वी’ में लंबा संवाद चला. लगभग २०० के आस पास प्रतिक्रियाएं आईं. स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों पर यह बातचीत अर्थगर्भित है. इससे स्त्री और पुरुष दोनों की मानसिकता और मनोविज्ञान पर प्रकाश पड़ता है. कविता की भूमिका और उसके प्रभाव का भी पता चलता है. फेसबुक के बाहर के मित्रों ने यह बहस देखने की इच्छा प्रकट की है. उनके लिए  
 ::





रविवार, 28 अगस्त 2011

स्मृतियाँ





















स्मृतियाँ

बुझे हुए दिनों की लपट भी जलाती है
  
सर्द रात में अपमान से भीगा वह भारी कम्बल
जिसके चुभन के निशान अभी भी हैं

प्रतिहिंसा की कड़वी चाय आज फिर पीने बैठा हूँ
कई बार सोचा आत्मघात के बारे में 
मैं हत्यारा होते होते रह गया  
चलने से रह गई वह बारूद, मेरे नथुनों में अभी भी है

कोयले से राख हटाता हूँ
थरथराती वह लपट फिर दिख जाती है

वह लपलपाती हुई धार
जो वर्षों से पी रही है मेरा ही रक्त

स्मृतियाँ
पिंजड़े की उस चिडिया की तरह हैं
जब-जब बाहर आती हैं 
खरोंच और चोट लिए आती हैं.