
ओबामा
पचास साल पहले मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने देखा था एक सपना
अलगाव की हथकडी और भेदभाव की जंजीरों में जकडे भौतिक सम्पन्नता के हहराते समुद्र में
निर्धनता के एकाकी द्वीप की तरह अपनी ही धरती पर निर्वासितअलगाव की हथकडी और भेदभाव की जंजीरों में जकडे भौतिक सम्पन्नता के हहराते समुद्र में
कालों का एक सपना
चिलचिलाती धूप में समानता और स्वतंत्रा के महकते
वसंत का सपना
एक ऐसा मरूद्यान जहां बच्चे रंग की चारदीवारी से मुक्त हों
और रंग नहीं कार्य दमके
कलह को भ्रातृत्व के राग में ढल जाने का सपना
जो अंततः अमेरिका का ही सपना था
बराक हुसैन ओबामा को क्या उस स्वप्न की याद है
कहते हैं ओबमा विचार नही
वह तो एक चेहरा है
एक ऐसा चेहरा जिससे जुड़ गयी हैं कुछ अस्मितापरक आशाएँ
४२ श्वेत राष्ट्रपतियों के बाद एक अश्वेत को बैठाकर
अमेरिका अपने अपराध बोध से बाहर निकल रहा है
अंततः ओबामा को एक बुश ,किलन्टन , या रीगन ही होना है
वह मार्टिन लूथर नहीं हो सकता
केन्या के उस सुदूर गावँ की रंगहीन शामों में
शायद ही कोई फर्क आए
जहां उसके नन्हें पैरों के निशान हैं
शायद ही कोई फर्क आए
विश्व में भर गये अमेरिकी धुएँ के कसैलेपन में
उसके अहम के अट्टहास में
इस नये चहरे से अमेरिका उतार रहा है अपनी थकान
बराक के कन्धे पर श्वेत अमेरिका का बोझ है
6 टिप्पणियाँ:
Well! very nice poetry.
"४२ श्वेत राष्ट्रपतियों के बाद एक अश्वेत को बैठाकर
अमेरिका अपने अपराध बोध से बाहर निकल रहा है"
बहुत ख़ूब। शुभकामनाएँ !!!
बहुत बढ़िया. कितनी सटीक पहचान की थी आपने अरुण जी. साल भर पहले आपकी काव्य-दृष्टि ने जो दिखाया था वह कितना सही साबित हो रहा है. सचमुच "बराक के कंधे पर श्वेत अमेरिका का बोझ है."
अंततः ओबामा को एक बुश ,किलन्टन , या रीगन ही होना है
वह मार्टिन लूथर नहीं हो सकता
केन्या के उस सुदूर गावँ की रंगहीन शामों में
शायद ही कोई फर्क आए
जहां उसके नन्हें पैरों के निशान हैं
शायद ही कोई फर्क आए
विश्व में भर गये अमेरिकी धुएँ के कसैलेपन में
उसके अहम के अट्टहास में
इस नये चहरे से अमेरिका उतार रहा है अपनी थकान
बराक के कन्धे पर श्वेत अमेरिका का बोझ है
अरुण जी , सही समय पर आपने ये सार्थक रचना हम सभी तक पहुंचाई ...
ओबामा सच में नहीं बन सकता मार्टिन लूथर .
बहुत सुन्दर कविता !
केन्या के उस सुदूर गावँ की रंगहीन शामों में..शायद ही कोई फर्क आए..जहां उसके नन्हें पैरों के निशान हैं
ओबामा के द्वंद्व को पेश करती अच्छी कविता. दरअसल यह द्वंद्व प्रकारान्तर से हर उत्पीडित का द्वंद्व है. भारतीय संदर्भ में दलित, आदिवासी, औरत आदि के साथ यही स्थिति पैदा होती है जब वे संघर्ष कर सत्ता का हिस्सा बनते हैं. सत्ता के चरित्र के अनुसार काम करना उनकी मजबूरी होती है, इसी वजह से वे अपने समुदाय के लिए कुछ नहीं कर पाते. इसका अतिक्रमण करने वाला ही सच्चा नायक होता है.
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