शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009

ओबामा









ओबामा




पचास साल पहले मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने देखा था एक सपना
अलगाव की हथकडी और भेदभाव की जंजीरों में जकडे भौतिक सम्पन्नता के हहराते समुद्र में
निर्धनता के एकाकी द्वीप की तरह अपनी ही धरती पर निर्वासित
कालों का एक सपना



चिलचिलाती धूप में समानता और स्वतंत्रा के महकते
वसंत का सपना
एक ऐसा मरूद्यान जहां बच्चे रंग की चारदीवारी से मुक्त हों
और रंग नहीं कार्य दमके



कलह को भ्रातृत्व के राग में ढल जाने का सपना
जो अंततः अमेरिका का ही सपना था
बराक हुसैन ओबामा को क्या उस स्वप्न की याद है



कहते हैं ओबमा विचार नही
वह तो एक चेहरा है
एक ऐसा चेहरा जिससे जुड़ गयी हैं कुछ अस्मितापरक आशाएँ
४२ श्वेत राष्ट्रपतियों के बाद एक अश्वेत को बैठाकर
अमेरिका अपने अपराध बोध से बाहर निकल रहा है




अंततः ओबामा को एक बुश ,किलन्टन , या रीगन ही होना है
वह मार्टिन लूथर नहीं हो सकता
केन्या के उस सुदूर गावँ की रंगहीन शामों में
शायद ही कोई फर्क आए
जहां उसके नन्हें पैरों के निशान हैं
शायद ही कोई फर्क आए
विश्व में भर गये अमेरिकी धुएँ के कसैलेपन में
उसके अहम के अट्टहास में

इस नये चहरे से अमेरिका उतार रहा है अपनी थकान
बराक के कन्धे पर श्वेत अमेरिका का बोझ है







6 टिप्पणियाँ:

Bablu ने कहा…

Well! very nice poetry.

Farid Khan ने कहा…

"४२ श्वेत राष्ट्रपतियों के बाद एक अश्वेत को बैठाकर
अमेरिका अपने अपराध बोध से बाहर निकल रहा है"

बहुत ख़ूब। शुभकामनाएँ !!!

मनोज पटेल ने कहा…

बहुत बढ़िया. कितनी सटीक पहचान की थी आपने अरुण जी. साल भर पहले आपकी काव्य-दृष्टि ने जो दिखाया था वह कितना सही साबित हो रहा है. सचमुच "बराक के कंधे पर श्वेत अमेरिका का बोझ है."

Aparna Manoj Bhatnagar ने कहा…

अंततः ओबामा को एक बुश ,किलन्टन , या रीगन ही होना है
वह मार्टिन लूथर नहीं हो सकता
केन्या के उस सुदूर गावँ की रंगहीन शामों में
शायद ही कोई फर्क आए
जहां उसके नन्हें पैरों के निशान हैं
शायद ही कोई फर्क आए
विश्व में भर गये अमेरिकी धुएँ के कसैलेपन में
उसके अहम के अट्टहास में

इस नये चहरे से अमेरिका उतार रहा है अपनी थकान
बराक के कन्धे पर श्वेत अमेरिका का बोझ है
अरुण जी , सही समय पर आपने ये सार्थक रचना हम सभी तक पहुंचाई ...
ओबामा सच में नहीं बन सकता मार्टिन लूथर .
बहुत सुन्दर कविता !

Nilay Upadhyay ने कहा…

केन्या के उस सुदूर गावँ की रंगहीन शामों में..शायद ही कोई फर्क आए..जहां उसके नन्हें पैरों के निशान हैं

GS Meena ने कहा…

ओबामा के द्वंद्व को पेश करती अच्‍छी कविता. दरअसल यह द्वंद्व प्रकारान्‍तर से हर उत्‍पीडित का द्वंद्व है. भारतीय संदर्भ में दलित, आदिवासी, औरत आदि के साथ यही स्थिति पैदा होती है जब वे संघर्ष कर सत्‍ता का हिस्‍सा बनते हैं. सत्‍ता के चरित्र के अनुसार काम करना उनकी मजबूरी होती है, इसी वजह से वे अपने समुदाय के लिए कुछ नहीं कर पाते. इसका अतिक्रमण करने वाला ही सच्‍चा नायक होता है.