हँसी के लिए प्रार्थना
जीवन के जंगल,रेत, पहाड़ में
कलकल सुने हम हँसी की नदी का
हँसी की चमक में
धुल जाए मन का कसैलापन
हो जाए आत्मा उज्ज्वल
यह हँसी निर्बल,निर्धन,निरीह पर न गिरे
न इसके छीटें छीटाकशी करें जो रह गये हैं पीछें
थक कर बैठा गए हैं कभी पथ में
उतर गए हैं कहीं अपने में ही नीचे
बह जाए रोजाना के कीच, कपट,कपाट
निर्बंध,निर्द्वन्द्व,निष्कलुष यह हँसी
जोडें नदी के निर्जन द्वीपों को
सरस,सहज,सहयोगी बनें हम
स्वाद हो ऐसा इस हँसी का
जो भूखे, दूखों को भी रुचे .

3 टिप्पणियाँ:
यह हँसी खिलखिलाती रहे जो सरस,सहज,सहयोगी बनें जी भूखों को औ दुखियों को भी भाये .. एक सुन्दर हँसी के भावो को ले कर हँसी की विवेचना करती हुवी तह कविता अच्छी लगी ...सादर
स्वाद हो ऐसा इस हँसी का
जो भूखे, दूखों को भी रुचे .
बड़ी अच्छी बात/सोच
यह हँसी निर्बल,निर्धन,निरीह पर न गिरे
न इसके छीटें छीटाकशी करें जो रह गये हैं पीछें
थक कर बैठा गए हैं कभी पथ में
उतर गए हैं कहीं अपने में ही नीचे
बह जाए रोजाना के कीच, कपट,कपाट
निर्बंध,निर्द्वन्द्व,निष्कलुष यह हँसी
जोडें नदी के निर्जन द्वीपों को
सरस,सहज,सहयोगी बनें हम
स्वाद हो ऐसा इस हँसी का
जो भूखे, दूखों को भी रुचे .
कितनी सहज , सुन्दर .. जैसे जीवन की प्रार्थना ..
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