रविवार, 22 नवम्बर 2009

खिलौना

















खिलौना


धरती  पर  उसके  आगमन की अनुगूँज  थी
व्यस्क संसार में बच्चे की आहट से  
उठ बैठा कब का सोया बच्चा
और अब वहाँ एक गेंद थी
एक ऊँट थोडा सा उट - प- टांग
बाघ भी  अपने  अरूप पर  मुस्कराए  बिना न  रह सका 

पहले  खिलोने की खुशी  में
धरती गेंद की तरह हल्की होकर लद गयी
हडप्पा और मोहनजोदड़ो से मिले मिट्टी की गाड़ी   पर

जिसे तब से खीचे ले जा रहा है वह शिशु .

प्रतिध्वनी
















प्रतिध्वनि


एक शाम
भीतर की ऊमस  और  बाहर के घुटन से घबराकर
निकल पड़ा नदी के साथ-साथ
नदी जो नगर के बाहर
धीरे-धीरे बहे  जा रही है


अब यह जो बह रहा है वह कितना पानी है
कितना समय   कहना मुश्किल है ?


बहरहाल  शहर के चमक और शोर के बीच
उसका एकाकी बहे जाना
मुझे अचरज में डाल रहा था
जैसे यह नदी इतिहास से  सीधे  निकल कर
यहाँ आ गयी हो
अपनी निर्मलता में प्रार्थना  की तरह


कोई  अदृश्य  पुल था जो  जोड़ता था
बाहर  के पानी को भीतर  के जल से


कि जब पुकारता था बाहर का प्रवाह
टूट कर  गिरता था अन्दर  का बांध.




रविवार, 15 नवम्बर 2009

हँसी के लिए प्रार्थना





















हँसी के लिए प्रार्थना




जीवन के जंगल,रेत, पहाड़  में
कलकल सुने हम हँसी की नदी  का

हँसी की चमक में
धुल जाए मन का कसैलापन
हो जाए आत्मा उज्ज्वल

यह हँसी निर्बल,निर्धन,निरीह पर न गिरे
न इसके छीटें छीटाकशी करें जो रह गये हैं पीछें
थक कर बैठा गए हैं कभी पथ   में
उतर गए हैं कहीं अपने में ही नीचे

बह जाए रोजाना  के कीच, कपट,कपाट

निर्बंध,निर्द्वन्द्व,निष्कलुष यह हँसी
जोडें नदी के निर्जन द्वीपों को
सरस,सहज,सहयोगी बनें हम

स्वाद हो ऐसा इस हँसी का
जो भूखे, दूखों को भी रुचे .



रविवार, 8 नवम्बर 2009

झीनी चदरिया





















झीनी चदरिया






चादर को मैली होने से बचाने के
कितने जतन थे सहाय बाबू के पास
देह पर  बोझ न रहे यह सोच कर        
मैल न जमने दिया मन में
कभी हबक कर नही बोला
कभी ठबक कर नही चले
गेह की देहरी से उठाते रहे प्यास से भरा लोटा
जब भी गये भूख  से  भरी थाली के पास
श्रम का पसीना पोछ कर गये
कभी-कभी निकल आते ईर्ष्या - द्वेष के कील कांटे
पैंट की जेब मे चला आता स्वार्थ
अहं की टाई  को बार-बार ढीला करते
अधिकार के पेन को बहकने नही दिया
चादर को जस का तस लौटने  का स्मरण था सहाय बाबू को
हालाँकि हबक कर बोले बिना कोई सुनता न था
ठबक  कर न चलने में पीछे रह जाने का अपमान था


सहाय बाबू छडी से ओस की बूंदों  को छूते
जैसे वह  गोरख और कबीर के आंसू हों .