arun dev
संवादी
बुधवार, 14 अप्रैल 2010
मित्र दरवाजा
मित्र दरवाजा
गली का वह मुस्काता दरवाजा
आज खुला मेरे आगंन मे
तन का बदरंग चेहरा खिल-खिल गया
महक महक सी गयी हवा
एक गौरैया बेखटके, बिनआहट
आयी मेरे सिरहाने
न मैं निकलू
न निकलने दे
वह
उसकी नीद मे खोया
भटकता उसके ख्वाबो मे
दर-ब-दर मैं.
1 टिप्पणियाँ:
अपर्णा मनोज
ने कहा…
बड़ी मन भावन रचना ..
7 अप्रैल 2011 2:53 pm
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बड़ी मन भावन रचना ..
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