
सीख
ये पुरखों की सीख है
सच चाहे अप्रिय ही क्यों न हो
कहते रहना अपने सबसे प्रिय से
अब यही एक रास्ता बचा है दोनों को बचाने का
महत्वाकांक्षा की बर्बरता और लोभ के अंधड में
जाग्रत रखना अपना विवेक
संग्रह के ढेर और बाजार के शोर से हट कर
कभी वह संतोष भी पाना
जो छिपा रहता है संगीत,साहित्य और विचारों की कोख में
करते रहना प्रयास कि प्रेम
पशुओं और वनस्पतिओं के लिए भी पनपे
जैसाकि वे अभी भी भूले नहीं हैं तुम्हें
देह की सुख साधना में
मन का अपरिग्रह भी सीखना
भारी मन लिए कहाँ जाओगे?
उत्सव की रौशनी में
एकांत का मौन अगर सुन सको तो सुनना
यह न भूलना कि लौटाना है तुम्हें
हवा,जल,मिट्टी,आकाश
और बार-बार लौटना भी है तुम्हें पृ्थ्वी पर
अपनी ही संततियों की आँखों में
यथार्थ की खुरदरी सतह पर
भविष्य के स्वप्न की गुंजाइश रखना
जो रह गये पीछे
बढ़ा देना उनके लिए हाथ
ये पुरखों की सीख है
इसे दुहरा भर रहा हूँ
कि भुला न दिया जाए कहीं.
19 टिप्पणियाँ:
यह न भूलना कि लौटाना है तुम्हें
हवा,जल,मिट्टी,आकाश
और बार-बार लौटना भी है तुम्हें पृथ्वी पर
अपनी संततियों की आखों में...
sundar rachna arun..
badhai!
यथार्थ की खुरदरी सतह पर
भविष्य के स्वप्न की गुंजाइश रखना
जो रह गये पीछे
बढ़ा देना उनके लिए हाथ
"सीख"
कभी वह संतोष भी पाना
जो छिपा रहता है संगीत,साहित्य और विचारों की कोख में......बहुत सुन्दर..
करते रहना प्रयास कि प्रेम
पशुओं और वनस्पतिओं के लिए भी पनपे........ओह्ह्ह मार्मिक..
ये पुरखों की सीख है
इसे दुहरा भर रहा हूँ..............हर पंक्ति..लाजवाब...आदमी को उसकी आदमियत का अहसास कराया है .....साथ ही..अगली पीढ़ी तक उन मूल्यों को बचाने व पहुंचाने की पीड़ा भी साथ.कुछ इसी अंदाज का .जेसे अब्राहम लिकं कहते हैं अपने पुत्र के शिक्षक से...हो सके तो मेरे बेटे को ये पढ़ा देना.इसी अंदाज में .भवानीप्रसाद मिश्र भी आदमी को उद्वेलित करते लिखते हैं...इतना अकेला तो सूरज भी नहीं चाहता उससे ज्यादा अकेलापन तुम चाहोगे म्रत्यु तक तटस्तथा निभाओगे...
सुन्दर....
बहुत अर्थवान और परिपक्व कविता, अपना अलग मुहावरा बनाती हुई.....आप्की कविता से अपार संभावनाएँ हैं।
यह छोटी सी कविता उस बड़ी दुनिया को बचा ले जाने की जद्दोजेहद करती है जो आज बाज़ार के निशाने पर है…
जो रह गये पीछे
बढ़ा देना उनके लिए हाथ
ये पुरखों की सीख है
इसे दुहरा भर रहा हूँ
कि भुला न दिया जाए कहीं.
बहुत ही गहन आध्यात्मिक अनुभूति है
यथार्थ की खुरदरी सतह पर
भविष्य के स्वप्न की गुंजाइश रखना........................ये पुरखों की सीख है
achhchhee kavitaa
वह बहुत सुन्दर अद्भुत !
आजकल अच्छी कवितायेँ दुर्लभ हैं ...
अरुण जी बहुत बहुत शुक्रिया
बहुत असरदार कविता है |
arun
wah wah
हर तरह से एक बहुत अच्छी कविता ,
मेरा बस चले तो मैं इसे इंटर के
कोर्स में लगवा दूं ! सबके लिए पठनीय
और संजोने योग्य रचना ! आत्मीय-
जैसे एक पिता अपनी संतान में अपनी
आत्मा बो रहा हो !
बहुत बधाई देव जी !
यह न भूलना कि लौटाना है तुम्हें
हवा,जल,मिट्टी,आकाश
और बार-बार लौटना भी है तुम्हें पृ्थ्वी पर
अपनी ही संततियों की आखों में
यथार्थ की खुरदरी सतह पर
भविष्य के स्वप्न की गुंजाइश रखना ....
Bahut sundar...
badhai aapko...
स्....सशक्त...सुंदर...सार्थक !
'उत्सव की रौशनी में
एकांत का मौन अगर सुन सको तो सुनना
यह न भूलना कि लौटाना है तुम्हें
हवा,जल,मिट्टी,आकाश
और बार-बार लौटना भी है तुम्हें पृ्थ्वी पर
अपनी ही संततियों की आखों में...'
...बहुत सुन्दर..
बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति .......!!
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