
यायावर
यह रास्ता कहाँ जाता है
रौशनी में डूबी दोपहरी से
एक जोड़ी जूते ने पूछा
जूते के चेहरे पर यायावरी के गहरे निशान थे
फीकी मुस्कान लिए दोपहर ने
शाम की छतरी तान ली
शाम को रात में गिरना था
रात में जुगनू की लाठी पकड़े
उस एक जोड़ी को फिर भी
कहीं जाना था
क्या कोई रास्ता कहीं जाता है ?
रेत के समुद्र में उस कंटीली झाडियों से
पूछा था उसने
जहाँ दिशाएं एक दूसरे में गुम
किसी अंतहीन विस्तार में खो गयी थी
घडी की टिकटिक से
जाना जा सकता था काल को
जिसकी पूछ को खा रहा उसका ही मुंह
दिशाहीन अनंत काल में यायावरी?
पेड़ पर पीठ टिकाये
उसका प्रश्न चिडियों की चहचहाहट में बदल गया था
जूते के तस्मे बांधते हुए
उसे पहाड़ी के उस पार जाना था
उसे अभी अपने से भी
पार जाना था .
5 टिप्पणियाँ:
Bahut sundar!!
One of the best poems written by you!
I happen to come here and readt it again and again. Enjoy each time, better than before. Brilliant!!
beautiful poem ..
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