शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

रक्त बीज










रक्त बीज

जैसे कोई अभिशप्त मंत्र जुड़ गया हो मेरे नाभि–नाल से
हर पल अभिषेक करता हुआ मेरी आत्मा का
मेरी हर कोशिका से प्रतिध्वनित है उसका ही नाद
उसकी थरथराहट की लपट से जल रहीं हैं मेरी आँखें


इस धरा के सारे फल मेरे लिए
काट लूँ धरती की सारी लकड़ी
निकाल लूँ एक ही बार में सारा कोयला
और भर दूँ धुएं से दसों दिशाओं को

मेरी थाली भरी है
कहीं टहनी पर लटके किसी घोसलें के अजन्मे शिशु के स्वाद से
अब चुभता नहीं किसी लुप्तप्राय मछली का कोई कांटा
मेरे समय को  

मेरी इच्छा के जहरीले नागों की फुत्कार से
नीला पड़ गया है आकाश
जहां दम तोड़ कर गिरती है
पक्षिओं की कोई-न-कोई प्रजाति रोज


गुनगुनाता हूँ मोहक क्रूरता के छंद
झूमता हूँ निर्मम सौंदर्य के सामूहिक नृत्य में
भर दी है मैंने सभ्यता की वह नदी शोर और चमक से
जो कभी नदी की ही तरह निर्मल थी
अब तो वहाँ भाषा का फूला हुआ शव है
किसी संस्कृति के बासी फूल

नमालूम आवाज में रो रहा है कोई वाद्ययंत्र  

मेरे रक्त बीज हर जगह एक जैसे
एक ही तरह बोलते हुए
खाते और गाते और एक ही तरह सोचते हुए

देखो उनकी आँखों में देखो मेरा अमरत्व.

4 टिप्पणियाँ:

प्रभात रंजन ने कहा…

कविता तो अच्छी लगी ही आपके ब्लॉग का ले आउट भी बहुत बढ़िया लगा.
बधाई.

DR. SHIV SHANKAR MISHRA ने कहा…

priya, aaj aapke blog par aayaa. Aap sachmuch kee kavitaa likhate hain. Ped kee tahanee se latakate ghonsale me ajanme shishu, anjaanee aawaaj me rotaa vaadyayntra-aur bhi bahut kuchh avachetan me sahaj hee samaa jaataa hai. Hangaame ke daur me maun kee shlaaghaa karane vaale rachanaakaaron kee sankhyaa bahut nahin hai hindee me.

डा. सुभाष राय ने कहा…

प्रिय भाई अरुन, आप की इस कविता की चर्चा ब्लाग 4 वार्ता में भी हुई है. मैने साखी पर आप के ब्लाग का लोगों लगाया है। साखी एक प्रयोग है। इस मंच पर हर शनिवार को एक नया रचनाकार प्रस्तुत होना है। मैं चाहता हूं कि सिर्फ ब्लागबाजी की शैली में नहीं बल्कि रचनाओं पर गम्भीर बातचीत हो। धीरे-धीरे यह अपनी शकल लेगा। अगर आप को कभी फुरसत मिला करे तो साखी पर जरूर आयें और आयें तो भय, पक्षपात के बिना अपनी बात जरूर दर्ज करें। धन्यवाद। पता है---

www.sakhikabira.blogspot.com

Anoop ने कहा…

हम्म.. ये है... धांसू कविता