शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

ग़ालिब





















ग़ालिब


ग़ालिब पर सोचते हुए
वह दिल्ली याद आई
जिसके गली कूचे अब वैसे न थे
आसमान में परिंदों के लिए कम थी जगह
उड़कर जाते कि लौट आते हैं अभी

शब–ओ-रोज़ होने वाले बाजीच:-ए-अत्फाल में
मसरूफ थी हर सुबह
इब्न –ए –मरियम थे
दुःख की दवा न थी

इस शोर में
एक आवाज़ थी बल्लीमारान से उठती हुई
लेते थे जिसमें अदब के आदमकद बुत
गहरी-गहरी साँसे
हिंदुस्तान की नब्ज़ में पिघलने लगता था पारा,सीसा,आबनूस
दीद–ए-तर से टपकता था लहू
उस ख़स्ता के ‘अंदाज़–ए-बयाँ और’ में वह क्या था
कि हिलने लगती थी बूढ़े बादशाह की दाढ़ी
थकी सल्तनत की सीढियाँ उतरते उसकी फीकी हँसी के
न मालूम कितने अर्थ थे
उसने देखा था
तमाशा देखने वालों का तमाशा
उसकी करुणा में डूबी आँखों में हिज़्र का लम्बा रेगिस्तान था
जिसके विसाल के लिए उम्र भी कम ठहरी

दिल्ली और कलकत्ता के बीच कहीं खो गयी थी
उसकी रोटी
टपकती हुई छत और ढहे हुए महलसरे को
कलम की नोक से संभाले
वह जिद्दी शायर ताउम्र जद्दोजहद करता रहा कि
निकल आये
फिरदौस और दोजख को मिलाकर भी
ज़िन्दगी के लिए थोड़ी और गुंजाइश .    

(‘क्या तो समय’,ज्ञानपीठ नई दिल्ली-2004)

5 टिप्पणियाँ:

डा.सुभाष राय ने कहा…

Arun, aap kee kavita padhi aur Parmanand jee kee aap kee kavitaon par tippadi bhee. philhaal to main ek nayee tajagee aur tripti ke saath laut raha hoon. jab Parmanand jee kee tippadi se mukt ho jaoonga to kuchh kahoonga. abhi kuchh kahana theek nahee hoga kyonki usmen padha hua utar sakata hai.

VARUN GAGNEJA ने कहा…

BAHUT ACHHI KAVITA HAI ARUN JI. PADH KE LAGTA HAI KI POORA DIWAN E GHALIB PADH LIYE. DHNAYAWAD ITNI ACHHI KAVITA PATHKON KI NAZR KARNE KE LIYE

Aparna Manoj Bhatnagar ने कहा…

स ख़स्ता के ‘अंदाज़–ए-बयाँ और’ में वह क्या था
कि हिलने लगती थी बूढ़े बादशाह की दाढ़ी
थकी सल्तनत की सीढियाँ उतरते उसकी फीकी हँसी के
न मालूम कितने अर्थ थे
उसने देखा था
...तमाशा देखने वालों का तमाशा
उसकी करुणा में डूबी आँखों में हिज़्र का लम्बा रेगिस्तान था
जिसके विसाल के लिए उम्र भी कम ठहरी
हिन्दुस्तान का दर्द ...
और फिर यूँ बयां करना -
दिल्ली और कलकत्ता के बीच कहीं खो गयी थी
उसकी रोटी
टपकती हुई छत और ढहे हुए महलसरे को
कलम की नोक से संभाले
वह जिद्दी शायर ताउम्र जद्दोजहद करता रहा कि
निकल आये
फिरदौस और दोजख को मिलाकर भी

ज़िन्दगी के लिए थोड़ी और गुंजाइश .

rafat ने कहा…

सुंदर चित्र के नीचे एक चिराग रखा है जो यह रचना है .गली बल्लीमारान से खुश्बू उड़ कर पाठक तक पहुँच रही और आल्हादित कर रही है .हज़रत ग़ालिब को चिंतनपूर्ण खिराजेअकिदत पेश करने के लिए साधुवाद

Avanish Gautam ने कहा…

अरूण भाई, बढिया कविता!!