रविवार, 22 अगस्त 2010

ढोल


ढोल

उस दिन
शाम ढलने को थी
कि कहीं से आने लगी थापों की आवाज़
कई दिनों से ढोल कुछ कह रहा था   
थप-थप में रुद्धा गला
शोर में उसकी पुकार अनसुनी रह जाती

इस लकदक समय में
जहां बिक रहा है अध्यात्म और
हर खुशी के पीछे दिख जाता है कोई प्रायोजक
ढोल न जाने कब से
शोर के चुप हो जाने की राह देख रहा था  
पर शोर था कि अनेक रूपों में
विचित्र ध्वनियों के साथ बढ़ता ही जाता

आज जरा सी दरार दिखी थी
वहीं से झर रहा था प्रकाश की तरह
मनुष्य की खुशी  का आदिम उद्घोष
अपनी थापों में लिखता हुआ मांगलिक संदेश
जिसे लेकर हवाएं पहुंच जाती हैं घर-घर

और देखते ही देखते
धरती के नए आये मेहमान की किलकारी के साथ
जुट जाते हैं कंठ
अब ढोल और उसका विनोद
हर थाप पर और ऊंचा होता जाता नाद
सुरीला होता जाता कंठ

ढोल दुभाषिया है
किसी शाम जब जुटती हैं परित्यक्त स्त्रियां
वह करता  अनुवाद उनके दुःख का
अपने  छंद में

उसे याद है पंद्रहवीं शताब्दी की वह कोई रात
जब हाथ में लुकाठी लिए कबीर जैसा कोई
खड़ा हो गया था बाज़ार में
मशाल की रौशनी में चमकते उस जुलूस से आ रही थी
पुकारती हुई आवाज

क्या करे ढोल अपनी उस आवाज़ का .
  

4 टिप्पणियाँ:

सुशीला पुरी ने कहा…

इस स्वादहीन समय मे ,एक जायकेदार रचना !

डा.सुभाष राय ने कहा…

bhaai Arun, kilane blogon par kitanee baar. kai jagah yah rachana padhane ko mili. abhee anunaad par deekh raha tha, kal facebook par, parasn jansatta men. aap kee ek khaasiyat mujhe pasand aaati hai. koi saadhaaran saa vishya chunna aur phir itihaas me usakee talaash karna, vartamaan ka sandarbh gadhanaa aur bhavishyat sambhaavana kee gunj ke saath kaavy paath khatm kar denaa. achchhee shailee hai. badhaai achchhee rachana ke liye.

DR. SHIV SHANKAR MISHRA ने कहा…

very good

सुनील गज्जाणी ने कहा…

arun jee
namaskar !
aap ki khoob soorat rachaon aur sunder blog ke liye hardik badhai ,
sadhuwad !
saadar!