सोमवार, 27 सितम्बर 2010

उसका आना



















उसका आना

वह मिलने कैसे आती
बारिश हो रही थी
कीचड़ फैला था
घर और बाहर के कीचड़ में
कब से धंसी थी वह

बहुत दिनों से उमड़ घुमड़ रहे थे बादल
रात भर बरसा था मेघ
रात भर भीगता रहा उसका मन

भीग कर फैल गयी थी स्याही उस इबारत की
जो खनकती थी जंजीरों की तरह
रात का पैरहन स्याह और भारी हो गया था

चौखट के उस पार गिरी थी बिजली
शायद उस पर

गहरी नदी
उफनता पानी
उस पार मुन्तजिर वह भीगता हुआ उसकी चाह में

डरती है अपने कदमों के निशान से
निशान तो निशान हैं
बार बार उभर आते हैं
हर गली, हर नगर में
समय-कुसमय

इन पैरों पर पैर रखती चली आती है क्रूरता अपनों की.


1 टिप्पणियाँ:

सुनील गज्जाणी ने कहा…

डरती है अपने कदमों के निशान से
निशान तो निशान हैं
बार बार उभर आते हैं
हर गली, हर नगर में
समय-कुसमय

इन पैरों पर पैर रखती चली आती है क्रूरता अपनों की.
अरुण जी
नमस्कार !
बेहद सुंदर लगी ये पंक्तियाँ ,
साधुवाद !
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