लालटेन
अभी भी वह बची है
इसी धरती पर
अँधेरे के पास विनम्र बैठी
बतिया रही हो धीरे –धीरे
सयंम की आग में जैसे कोई युवा भिक्षुणी
कांच के पीछे उसकी लौ मुस्काती
बाहर हँसता रहता उसका प्रकाश
जरूरत भर की नैतिकता से बंधा
ओस की बूंदों में जैसे चमक रहा हो
नक्षत्रों से झरता आलोक
अक्सर अँधेरे को अँधेरे के बाहर कहा गया
अँधेरे का सम्मान कोई लालटेन से सीखे
अगर मंद न कर दिया जाए उसे थोड़ी देर में
वह ढक लेती खुद को अपनी ही राख से
सिर्फ चाहने भर से वह रौशन न होती
थोड़ी तैयारी है उसकी
शाम से ही संवरती
भौंए तराशी जातीं
धुल-पुछ कर साफ होना होता है
कि तन में मन भी चमके
और जब तक दोनों में एका न हो
उजाला हँसता नहीं
कुछ घुटता है और चिनक जाता है कहीं
भभक कर बुझ जाती है लौ
वह अलंकार नहीं थी कभी भी
न अहंकार, न ऐठ, न अति
कि चुकानी पड़े कीमत और फिर जाए मति
उसे तो रहना ही है.

3 टिप्पणियाँ:
वाह वाह अरुण जी ! क्या ख़ूबसूरत रचना आपकी लेखनी से एक बार फिर अवतरित हुई है....! लालटेन और बत्ती का श्रृंगार किसी नवेली दुल्हन की भाँति नए-नए बिम्बों से सँवार कर आपने प्रस्तुत किया है..! बहुत ही अच्छी लगी ये रचना..! बधाई ! आभार !!
लालटेन बचपन की उन स्मृतियों में ले गई जब उन्हें तैयार करना रोज का एक काम होता था। बहुत सुंदर रचना है।
प्रिय अरुण जी , यह मैं भी पूछता हूँ अक्सर किसी से कि " क्या कभी उलझते हैं मेरी यादों के धागे,तुम्हारी सलाईओं में भी"?
उत्तर नहीं मिलता लेकिन उसकी तो अपेक्षा भी करना अब व्यर्थ सा लगता है पर क्या किया जाए -- ये दिल है कि मानता नहीं। सशक्त सवाल हैं भले ही वह "कुफ्र " हो या " सरयू में कांप रही थी अयोध्या कि परछाईं"। सवाल शाश्वत हैं, जवाब हर इंसान दूंढ रहा है मैं भी और आप भी । सदियों से यही क्रम चल रहा है और लिखने वाले \ विचारक आम आदमी की, उसकी गरिमा की चिंता में घुलते जा रहे हैं , घुल रहे हैं । नतीज़ा क्या होगा नहीं पता पर कोशिश तो जारी रखनी ही होगी। सुना ज़रूर है की ईमानदार कोशिशों का नतीज़ा आखिकार अच्छा ही निकलता है पर कब यह भविष्य के गर्भ में है। किताबें , लालटेन , उसका आना कवितायेँ एक नोस्टाल्जिया जगाती हैं और उद्वेलित भी करती हैं। कभी यदि मिले तो और बातें होंगी। इस वर्ष जब जून में मैं एक मौखिकी के लिए आपके विश्वविद्यालय आया था तब कवि के रूप में सिर्फ नाम जनता था अब कही मौक़ा लगा तो शायद भेंट हो सके। सुखद भविष्य की कामना करता हूँ ।
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