लय का भीगा कंठ
कह रहा था मैं कुछ
ठीक उसी तरह जैसे बांसुरी के इक छोर पर कहती है हवा
और जो देर तक गूंजता रहता है
मन की बावड़ी में
जिसकी सीढ़ी पर बैठे-बैठे
भीग जाती हैं आँखें
यह किसका रुदन है
कौन सी भाषा में हिचकियाँ बुदबुदाती हैं अपने पश्चाताप
न जाने क्या कहा हवा ने
और क्या तो सुना बाँस के उस खोखले टुकड़े ने
जहां कब से बैठा था वह सघन दुःख
जो इस धरती का है
किसी दरवेश, फकीर, संत का है
कि प्रेम रत जोड़ो के सामूहिक वध पर
विलाप करते उस क्रौंच का है
जो रो रहा है तबसे
जब अर्थ तक पहुचने के लिए
शब्दों के पुल तक न थे
और तभी से भीगा है
लय का कंठ
और जिसे कहने की कोशिश में रूँध जाता है मेरा गला.

5 टिप्पणियाँ:
यह किसका रुदन है
कौन सी भाषा में हिचकियाँ बुदबुदाती हैं अपने पश्चाताप
न जाने क्या कहा हवा ने
और क्या तो सुना बाँस के उस खोखले टुकड़े ने
जहां कब से बैठा था वह सघन दुःख
जो इस धरती का है
किसी दरवेश, फकीर, संत का है
कि प्रेम रत जोड़ो के सामूहिक वध पर
विलाप करते उस क्रौंच का है
जो रो रहा है तबसे
जब अर्थ तक पहुचने के लिए
शब्दों के पुल तक न थे
और तभी से भीगा है
लय का कंठ
और जिसे कहने की कोशिश में रूँध जाता है मेरा गला.
मन को छूने वाले बिम्ब ! कौनसी भाषा में हिचकियाँ बुदबुदाती हैं ...और फिर ये कहना नजाने क्या कहा हवा ने और क्या सुना बांस के उस खोखले टुकड़े ने ! इस विलाप को किसने सुना ? एक पीड़ा बांसुरी से गुज़र कर हवाओं में घुल गयी ! सुन्दर रचना ! प्रकाशन के लिए बधाई !
gaay ko kendra mey rakh kar banayaa chitr adbhut hai..
"न जाने क्या कहा हवा ने और क्या तो सुना बाँस के उस खोखले टुकड़े ने जहां कब से बैठा था वह सघन दुःख
जो इस धरती का हैकिसी दरवेश, फकीर, संत का है कि प्रेम रत जोड़ो के सामूहिक वध पर विलाप करते उस क्रौंच का है जो रो रहा है तबसे जब अर्थ तक पहुचने के लिए शब्दों के पुल तक न थेऔर तभी से भीगा है लय का कंठ
और जिसे कहने की कोशिश में रूँध जाता है मेरा गला"
बहुत ही भावप्रद पंक्तियाँ. एक सुन्दर और सार्थक रचना के लिए आपको बधाई आदरणीय अरुण जी. आभार !!
अद्भुद!!
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