बृहस्पतिवार, 2 सितम्बर 2010

लय का भीगा कंठ

















लय का भीगा कंठ


कह रहा था मैं कुछ
ठीक उसी तरह जैसे बांसुरी के इक छोर पर कहती है हवा
और जो देर तक गूंजता रहता है
मन की बावड़ी में
जिसकी सीढ़ी पर बैठे-बैठे
भीग जाती हैं आँखें

यह किसका रुदन है
कौन सी भाषा में हिचकियाँ बुदबुदाती हैं अपने पश्चाताप

न जाने क्या कहा हवा ने
और क्या तो सुना बाँस के उस खोखले टुकड़े ने
जहां कब से बैठा था वह सघन दुःख

जो  इस धरती  का है
किसी दरवेश, फकीर, संत का है
कि प्रेम रत जोड़ो के सामूहिक वध पर
विलाप करते उस क्रौंच का है
जो रो रहा है तबसे
जब अर्थ तक पहुचने के लिए
शब्दों के पुल तक न थे
और तभी से भीगा है
लय का कंठ

और जिसे कहने की कोशिश  में रूँध जाता है मेरा गला.


5 टिप्पणियाँ:

Aparna Manoj Bhatnagar ने कहा…

यह किसका रुदन है
कौन सी भाषा में हिचकियाँ बुदबुदाती हैं अपने पश्चाताप

न जाने क्या कहा हवा ने
और क्या तो सुना बाँस के उस खोखले टुकड़े ने
जहां कब से बैठा था वह सघन दुःख

जो इस धरती का है
किसी दरवेश, फकीर, संत का है
कि प्रेम रत जोड़ो के सामूहिक वध पर
विलाप करते उस क्रौंच का है
जो रो रहा है तबसे
जब अर्थ तक पहुचने के लिए
शब्दों के पुल तक न थे
और तभी से भीगा है
लय का कंठ

और जिसे कहने की कोशिश में रूँध जाता है मेरा गला.
मन को छूने वाले बिम्ब ! कौनसी भाषा में हिचकियाँ बुदबुदाती हैं ...और फिर ये कहना नजाने क्या कहा हवा ने और क्या सुना बांस के उस खोखले टुकड़े ने ! इस विलाप को किसने सुना ? एक पीड़ा बांसुरी से गुज़र कर हवाओं में घुल गयी ! सुन्दर रचना ! प्रकाशन के लिए बधाई !

girish pankaj ने कहा…

gaay ko kendra mey rakh kar banayaa chitr adbhut hai..

नरेन्द्र व्यास ने कहा…

"न जाने क्या कहा हवा ने और क्या तो सुना बाँस के उस खोखले टुकड़े ने जहां कब से बैठा था वह सघन दुःख
जो इस धरती का हैकिसी दरवेश, फकीर, संत का है कि प्रेम रत जोड़ो के सामूहिक वध पर विलाप करते उस क्रौंच का है जो रो रहा है तबसे जब अर्थ तक पहुचने के लिए शब्दों के पुल तक न थेऔर तभी से भीगा है लय का कंठ
और जिसे कहने की कोशिश में रूँध जाता है मेरा गला"
बहुत ही भावप्रद पंक्तियाँ. एक सुन्दर और सार्थक रचना के लिए आपको बधाई आदरणीय अरुण जी. आभार !!

Avanish Gautam ने कहा…

अद्भुद!!

बेनामी ने कहा…

I have searched your pages and site just returning from Agra Surya Narayan