विस्मरण
कब तक चमकती रहेगी मेरी स्मृति की वह पगडंडी
जहाँ से तुम चली गयीं कुहरे में
जहाँ से मैं लौट आया अँधेरे में
कितनी लम्बी है हमारी यादों की उम्र
कि कोई पत्ता टूट कर गिरे और काँप न जाएँ तुम्हारी आँखें
और न निकालने लगू मैं अपनी आँख से तिनका
कि कोई एक वाक्य तुम्हारे बिना
अपने अर्थ तक पहुंच जाए
कि जब कहूँ आज अच्छा नहीं लग रहा
तो सिर्फ इसका इतना ही मतलब हो
क्या कभी उलझते हैं मेरी यादों के धागे
तुम्हारी सलाईओं में भी
विस्मरण की धूल से कभी ढक जाऊंगा मैं
ढक जाओगी तुम
क्या मद्धिम पड़ जायेगा वह सुर
जिसमें कभी साझा थे हमारे कंठ
वो चिन्हित किए गये गद्य-पद्य
क्या खो देंगे अपना अर्थ
तुम्हारे सुनाये लतीफों की वह हंसी
क्या बुझ जायेगी
उठ रही अब भी उससे भाप.

9 टिप्पणियाँ:
खूबसूरत.....बहुत अच्छी अभिव्यक्ति
बधाई
वंदना
sundar rachna!
"विस्मरण की धूल से कभी ढक जाऊंगा मैं
ढक जाओगी तुम"
फिर- फिर... यही पंक्तियाँ सबसे ज़्यादा बांधती हैं
arun jee
namskaar !
ek sunder raachcna padhwane ke liye aabhar ,badhai
sadhuwad ,
bhap jab tak bani hai pyale me prem shaswat hai.......behatareen rachana.....
कई दिनों बाद एक अच्छी कविता पढ़ी . ज़िंदगी के दो मिनट मेरे सार्थक हुए ...
अद्भुत ....अतुलनीय...हर पंक्ति पर वाह निकले उसके लिए टिप्पणी थोडा छोटा शब्द है :)
विस्मरण की धूल से कभी ढक जाऊंगा मैं
ढक जाओगी तुम
क्या मद्धिम पड़ जायेगा वह सुर
जिसमें कभी साझा थे हमारे कंठ...
shayad yahi jivan hai .. samay acceptance ki demand karta hai aur jo chhut gaya so chhut gaya ..
bachchan ji ki panktiyan yaad ho aayin..
toote taron par ambar kab shok manata hai.... achchhi kavita hai.
कि कोई एक वाक्य तुम्हारे बिना
अपने अर्थ तक पहुंच जाए
कि जब कहूँ आज अच्छा नहीं लग रहा
तो सिर्फ इसका इतना ही मतलब हो
पूरी कविता अद्भुत....बहुत शुक्रिया अपर्णा जी ये खूबसूरत कविता फिर एक बार पढवाने के लिए.....
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