
कुफ्र
मैं प्रेम करना चाहता था ईश्वर से
बिना डरे बिना झुके
पर इसका कोई वैध तरीका स्थापित ग्रंथो में नहीं था
वहाँ भक्ति के दिशा–निर्देश थे
लगभग दास्य जैसे
जिन पर रहती है मालिक की नजर
मेरे अंदर का खालीपन मुझे उकसाता
उसकी महिमा का आकर्षण मुझे खींचता
जब-तब घिरता अँधेरे में उसकी याद आती आदतन
मैं समर्पित होना चाहता था
अपने को मिटाकर एकाकार हो जाना चाहता था
पर यह तो अपने को सौंप देना था किसी धर्माधिकारी के हाथों में
मैंने कुछ अवतारों पर श्रद्धा रखनी चाही
कृष्ण मुझे आकर्षित करते थे
उनमें कुशल राजनीतिज्ञ और आदर्श प्रेमी का अद्भुत मेल था
पर जब भी मैं सोचता
भीम द्वारा दुर्योधन के टांग चीरने का वह दृश्य मुझे दिखता
पार्श्व में मंद –मंद मुस्करा रहे होते कृष्ण
मुझे यह क्रूर और कपटपूर्ण लगता था
उस अकेले निराकार तक पहुचने का रास्ता
किसी पैगम्बर से होकर जाता था जिसकी कोई-न-कोई किताब थी
यह ईश्वर के गुप्त छापेखाने से निकली थी
जो अक्सर दयालु और सर्वशक्तिमान बताया जाता था
और जिसके पहले संस्करण की सिर्फ पहली प्रति मिलती थी
इसका कभी कोई संशोधित संस्करण नहीं निकलना था
शायद ईश्वर के पास कुछ कहने के लिए रह नहीं गया था
या उसकी आवाज़ लोगों ने सुननी बंद कर दी थी
उससे डरा जा सकता था या डरे-डरे समर्पित हुआ जा सकता था
अप्सराओं से भरे उस स्वर्ग के बारे में जब भी सोचता
मुझे दीखते धर्म-युद्धों में गिरते हुए शव
हिंसा और अन्याय के इस विशाल साम्रज्य में
जैसे वह एक आदिम लत हो
मठ और महंतो से परे
उस ईश्वर से प्रेम करने का क्या कोई रास्ता है
और क्या उसकी जरूरत भी है
अपने श्रम के अतिरिक्त क्या चाहिए मुझे ?
अपने श्रम के अतिरिक्त क्या चाहिए मुझे ?
8 टिप्पणियाँ:
आदरणीय अरुण जी
''कुफ्र""में अंतर्मन का विरोधाभास और उलझन को बहुत ही सच्चाई से उकेरा है आपने...पूरी की पूरी कविता बगैर किसी विराम के पढ़ जाना और उसे प्रतिपल ''अपना सा ''महसूस करना मेरी नज़र में कविता की सफलता का खुद एक सशक्त सबूत है!कृष्ण के ''चारित्रिक आकर्षण''(श्रध्दा)और''उसी के उलट उनकी ''कूटनीतिक चाल '' (संदेह) ''के बीच का द्वन्द .....अद्वितीय....
बहुत बधाई स्वीकारें
वंदना
ईश्वर मनुष्य का सबसे बड़ा आविष्कार है।
"अपने श्रम के अतिरिक्त क्या चाहिए मुझे ?"
यह सूत्र वाक्य आपने आप में एक बड़ी कविता है।
इस रचना के माध्यम से इक बड़ा संदेश
दे कर आपने कवि धर्म निभाया है।
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प्रवाहित रहे यह सतत भाव-धारा।
जिसे आपने इंटरनेट पर उतारा॥
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सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी
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bouth khub marak kaveki h
दुबारा मन उदास हुआ अरुण जी...
लाज़वाब ....!
और जिसके पहले संस्करण की सिर्फ पहली प्रति मिलती थी
इसका कभी कोई संशोधित संस्करण नहीं निकलना था
शायद ईश्वर के पास कुछ कहने के लिए रह नहीं गया था
या उसकी आवाज़ लोगों ने सुननी बंद कर दी थी
'जो संशोधित हो सके वह ईश्वर कैसा ,
उसने जो किताब लिखी ,अंतिम है ,
अब हमारे-तुम्हारे लिए
सोंचने को कुछ नहीं बचा ,
और धड पर सर होने का औचित्य भी !
सर की जगह अब अपना दिल रख दो
और उसकी धडकनों की ताल पर
देह को और उसकी जड़ों को जो धरती में गडी हैं,
और धरती को ,समूचे अंतरिक्ष को
फड़कने दो !'
arun ji , kavita ishvar ki satta ko chunauti deti hai bina apni vinamrta chhode.. yah adbhut hai. bahut badhai..
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