शुक्रवार, 10 दिसम्बर 2010

सिसिफस























सिसिफस

धूप उठी
और उठ कर बैठ गयी
नीद मेरी सोई पड़ी रही  

उस पर भार था एक पत्थर का
जिसे ले चढता उतरता था मैं रोज

मेरी नीद से
न जाने कहाँ चले गये महकती रातरानिओं के वे फूल
जिनसे बिधा रहता था मेरा दिन
कोई पुकार बजती रहती थी मेरे कानो को
जल के हिलते विस्तार से तारों की टिमटिमाती हुई

मेरी नीद पर खटखट नहीं करता अब
ओंस से भीगा वह हरा पत्ता
जो अभी भी अंतिम आकर्षण है
इस सृष्टि का
और सृष्टि किसी शेष नाग पर नहीं
इसी की नोंक पर टिकी है

मेरी नीद के जगने से पहले
उठ बैठती थी चिडिओं की चहचहाहट
नदी से लौटी हवा के गीले केश
बिखरे रहते थे मेरे गालों पर  

निरर्थक दिनचर्या की जंजीरों में जकड़ा
न जाने किस दलदल में
घिर गया हूँ मैं

एक ही रास्ते से आते-जाते
जैसे सारे रास्ते बंद हो गये हों

कौन बधिक है यह
जिसके जाल में फंस गया है मेरा दिन
और जिसके जंजाल में उलझ पड़ी हैं मेरी रातें. 


4 टिप्पणियाँ:

वंदना शुक्ला ने कहा…

अरुण जी
बहुत ही खूबसूरत कविता....
निरर्थक दिनचर्या कि.......रातें
लाज़वाब....
वंदना

उत्‍तमराव क्षीरसागर ने कहा…

सुंदर!

archana ने कहा…

अति सुंदर ...अरुण जी ...बहुत ही संवेदनशील और गहरी रचना

भरत तिवारी ने कहा…

ओंस से भीगा वह हरा पत्ता
जो अभी भी अंतिम आकर्षण है
इस सृष्टि का
और सृष्टि किसी शेष नाग पर नहीं
इसी की नोंक पर टिकी है
...
अरुण जी ...
दिल का वो हिस्सा जहाँ प्यार का दर्द महसूस होता है वहाँ से आह नहीं वाह निकली (जाने क्यों ?)

भरत