अरुण भाई तुम्हारी कविताएँ पढ़ता रहा हूँ। 1996-97 के बाद शायद अब तक हमारी भेंट नहीं हुई। यानी कविता के बाहर अभिसार का निपट अभाव। बहरहाल,संपर्क का सूत्र परितोष से हाथ लगा तो तुम तक पहुँच ही गया। बहुत शानदार और सशक्त रचनात्मकता का बहुत ही कायदे से कविता ढालने में इस्तेमाल की इस कीमियागिरी के लिए बधाई के पात्र।
12 टिप्पणियाँ:
waah !!!
सुंदर!
...शव होने तक..... वाह...बहुत प्यारी कविता...बधाई भाई....
इस कविता में एक बेचैन आरज़ू है जो अपनी ही तपिश से झुलसती और निखरती जा रही है ।
"शव होने तक"…और फिर कह सके -मुझ में हर रंग अब तुम्हारा है ……
अरुण जी
खूबसूरत कविता ....हमेशा कि तरह !
arun bhai , pranam !
'एक भौरे की इच्छा है कि वह रहे तुम्हारी पंखुडियोंमें
शव होने तक.
gahri abivyakti ,
sadhuwad
बहुत सुंदर कलात्मक
मेरे हमदम !
प्रिय अरुण जी ... सुन्दर बहुत सुन्दर
मैं भी वही भौंरा
भरत
अरुण भाई
तुम्हारी कविताएँ पढ़ता रहा हूँ। 1996-97 के बाद शायद अब तक हमारी भेंट नहीं हुई। यानी कविता के बाहर अभिसार का निपट अभाव। बहरहाल,संपर्क का सूत्र परितोष से हाथ लगा तो तुम तक पहुँच ही गया। बहुत शानदार और सशक्त रचनात्मकता का बहुत ही कायदे से कविता ढालने में इस्तेमाल की इस कीमियागिरी के लिए बधाई के पात्र।
सुशील कृष्ण गोरे
मुंबई
अभिसार पर निसार -रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातम्। भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पङ्कजालिः। कोशगते द्विरेफे इत्थं विचिन्तयति। हा हन्त हा हन्त नलिनीं गज उज्जहार।
shav ..hone tak.......sundar.......arun ji.....
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