शुक्रवार, 10 दिसम्बर 2010

अभिसार
















अभिसार



वहाँ मुझे एक नदी मिली धीरे धीरे बहती हुई
एक वृक्ष खूब हर भरा
अजाने पक्षिओं की चहचहाहट
खूब रसीले फल
एक फूल अपने ही मद में पसीजता हुआ

एक भौरे की इच्छा है कि वह रहे तुम्हारी पंखुडियों में
शव होने तक.




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12 टिप्पणियाँ:

सुशीला पुरी ने कहा…

waah !!!

उत्‍तमराव क्षीरसागर ने कहा…

सुंदर!

विमलेश त्रिपाठी ने कहा…

...शव होने तक..... वाह...बहुत प्यारी कविता...बधाई भाई....

त्रिपुरारि कुमार शर्मा ने कहा…

इस कविता में एक बेचैन आरज़ू है जो अपनी ही तपिश से झुलसती और निखरती जा रही है ।

पारुल "पुखराज" ने कहा…

"शव होने तक"…और फिर कह सके -मुझ में हर रंग अब तुम्हारा है ……

वंदना शुक्ला ने कहा…

अरुण जी
खूबसूरत कविता ....हमेशा कि तरह !

सुनील गज्जाणी ने कहा…

arun bhai , pranam !
'एक भौरे की इच्छा है कि वह रहे तुम्हारी पंखुडियोंमें
शव होने तक.
gahri abivyakti ,
sadhuwad

बेनामी ने कहा…

बहुत सुंदर कलात्मक

भरत तिवारी ने कहा…

मेरे हमदम !
प्रिय अरुण जी ... सुन्दर बहुत सुन्दर
मैं भी वही भौंरा
भरत

सुशील कृष्ण गोरे ने कहा…

अरुण भाई
तुम्हारी कविताएँ पढ़ता रहा हूँ। 1996-97 के बाद शायद अब तक हमारी भेंट नहीं हुई। यानी कविता के बाहर अभिसार का निपट अभाव। बहरहाल,संपर्क का सूत्र परितोष से हाथ लगा तो तुम तक पहुँच ही गया। बहुत शानदार और सशक्त रचनात्मकता का बहुत ही कायदे से कविता ढालने में इस्तेमाल की इस कीमियागिरी के लिए बधाई के पात्र।

सुशील कृष्ण गोरे
मुंबई

मुक्ताभ ने कहा…

अभिसार पर निसार -रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातम्। भास्वानुदेष्यति हसिष्यति पङ्कजालिः। कोशगते द्विरेफे इत्थं विचिन्तयति। हा हन्त हा हन्त नलिनीं गज उज्जहार।

Mita Das ने कहा…

shav ..hone tak.......sundar.......arun ji.....