तुम अब
तुम्हारे साथ कोई तुम सा याद आता है
तुम्हारी हंसी में वही परिचित से फूल
प्रारम्भ से ही अन्त की आहट
तुम्हारी खुशी में उस खुशी के मुरझाए हुए दुःख
इस अपनेपन में मुझे दिखती है
बेगानेपन की वह पगडण्डी
दलदल के ऊपर कुहरे से ढकी हुई
इस प्रेम में
प्रेम के ध्वंस की उदासियाँ
पार करता हूँ वह नदी,वही नदी
तट का बालू हमारे बीच
उसके नाम से बुला बैठता हूँ तुम्हे
इस प्रेम में उस प्रेम की शुरुआत.

23 टिप्पणियाँ:
अरुण जी,
कायनात में हर एक चीज़ उबाऊ है,
सिवाय खुद (खुदा) के...
पार करता हूँ वह नदी,वही नदी
तट का बालू हमारे बीच
उसके नाम से बुला बैठता हूँ तुम्हे
इस प्रेम में उस प्रेम की शुरुआत. ..
...बहुत सुन्दर कविता , अरुण जी ..खासकर ये पंक्तियाँ .
ख़ूबसूरत ....!
अच्छी लगी अरुण जी ....इस प्रेम में उस प्रेम की शुरुआत!!!!!Nirmal Paneri
यह कविता बहुत कुछ भुला बैठे को फिर से याद कराती है...क्या कहूँ...यह प्रेम को पंथ कराल महा...किस पीड़ा से गुज़रे होंगे आप इसकी रचना के समय, समझ सकता हूँ
सईद अय्यूब
sayeedayub@gmail.com
बहुत सुंदर... कविता पढ़ी है बिल्कुल अभी-अभी। क्या लिखूँ। अभी तो कविता प्रतिध्वनित होने के लिए अपने वलयों में फैल रही है। कई चित्र उभर रहे हैं। लेकिन पूरी बात बाद में। कविता की रेखाएँ वैसे ही खिंचती जा रही हैं जैसे सफेद बगुलों की उड़ान के बाद आसमान में कंपन और परों की फड़फड़ाहट उनके ओझल हो जाने बाद देर तक दिखाई भी देती रहती है... और सुनाई भी। बहुत अच्छी कविता।
सुशील कृष्ण गोरे
मुंबई
पार करता हूँ वह नदी,वही नदी
तट का बालू हमारे बीच
उसके नाम से बुला बैठता हूँ तुम्हे
सुन्दर पंक्तियाँ
अरुण जी!
"उसके नाम से बुला बैठता हूँ तुम्हें,
इस प्रेम में उस प्रेम की शुरुआत.."
एक मोहक पीड़ा स्पंदित हो रही है इन पंक्तियों में....
सुन्दर भावाभिव्यक्ति!
बेहद मार्मिक कविता। बधाई...
"उसके नाम से बुला बैठता हूँ तुम्हे"…बेख़्याली…
जैसे इमरोज़ की पीठ पर साहिर का नाम उकेरती अमृता की उँगलियां …
bahut sundar
achhi prastuti
सुंदर अति सुंदर मित्र
तुम्हारे साथ कोई तुम सा याद आता है...komal ehsaason ka ek srot ...
apni rachna सिसिफस vatvriksh ke liye bhejen rasprabha@gmail.com per parichay,tasweer, blog link ke saath
http://urvija.parikalpnaa.com/
पार करता हूँ वह नदी,वही नदी
तट का बालू हमारे बीच
उसके नाम से बुला बैठता हूँ तुम्हे
इस प्रेम में उस प्रेम की शुरुआत.बहुत सुन्दर कविता ,\
अरुण जी .खासकर ये पंक्तियाँ .
"is apanapan me" ki jagah "is apnepan me" jyada best rahega.
मुक्ताभ जी... बिलकुल ठीक कहा आपने... अब यह ज्यादा बेहतर हुआ है... बहुत बहुत आभार.
Aapki baaki kavitaaon se ye kavita kam se kam mujhe to kuchh kamzor lagi.. sorry :(
आपको पढना एक सुखद अनुभव से गुजरने जैसा है...शब्द और भाव का बेजोड़ संगम है आपकी रचना में...पारुल जी का धन्यवाद जिनके ब्लॉग ने आपका पता दिया...
नीरज
वाह...अतिसुन्दर...
पार करता हूँ वह नदी,वही नदी
तट का बालू हमारे बीच
उसके नाम से बुला बैठता हूँ तुम्हे
इस प्रेम में उस प्रेम की शुरुआत...
बहुत सुन्दर कविता हैं आपकी और ब्लॉग भी बेहद सुन्दर ... आज आपकी पोस्ट समालोचना ब्लॉग में देखी .. पाब्लो नेरुदा की कविताओं का हिंदी में अनुवाद
अपर्णा जी द्वारा .. मै वह पोस्ट और आपकी यह कविता कल (२५ फरवरी २०११ )चर्चामंच पर रख रही हूँ .,.. आपका आभार इन सुन्दर रचनाओ और पोस्ट के लिए ..
http://charchamanch.blogspot.com
बहुत खूबसूरत रचना
बडी गहन अभिव्यक्ति है…………उम्दा ख्याल्।
is prem me prem ki udasiyan........sundar alfasj.......khoob likhte ho.....
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