सोमवार, 10 जनवरी 2011

तुम अब





















तुम अब 

तुम्हारे साथ कोई तुम सा याद आता है
तुम्हारी हंसी में वही परिचित से फूल

प्रारम्भ से ही अन्त की आहट
तुम्हारी खुशी में उस खुशी के मुरझाए हुए दुःख

इस अपनेपन में मुझे दिखती है
बेगानेपन की वह पगडण्डी
दलदल के ऊपर कुहरे से ढकी हुई

इस प्रेम में
प्रेम के ध्वंस की उदासियाँ

पार करता हूँ वह नदी,वही नदी
तट का बालू  हमारे बीच
उसके नाम से बुला बैठता हूँ तुम्हे

इस प्रेम में उस प्रेम की शुरुआत. 



23 टिप्पणियाँ:

त्रिपुरारि कुमार शर्मा ने कहा…

अरुण जी,
कायनात में हर एक चीज़ उबाऊ है,
सिवाय खुद (खुदा) के...

Aparna Manoj Bhatnagar ने कहा…

पार करता हूँ वह नदी,वही नदी
तट का बालू हमारे बीच
उसके नाम से बुला बैठता हूँ तुम्हे

इस प्रेम में उस प्रेम की शुरुआत. ..
...बहुत सुन्दर कविता , अरुण जी ..खासकर ये पंक्तियाँ .

वंदना शुक्ला ने कहा…

ख़ूबसूरत ....!

Travel Trade Service ने कहा…

अच्छी लगी अरुण जी ....इस प्रेम में उस प्रेम की शुरुआत!!!!!Nirmal Paneri

Sayeed Ayub ने कहा…

यह कविता बहुत कुछ भुला बैठे को फिर से याद कराती है...क्या कहूँ...यह प्रेम को पंथ कराल महा...किस पीड़ा से गुज़रे होंगे आप इसकी रचना के समय, समझ सकता हूँ

सईद अय्यूब
sayeedayub@gmail.com

सुशील कृष्ण गोरे ने कहा…

बहुत सुंदर... कविता पढ़ी है बिल्कुल अभी-अभी। क्या लिखूँ। अभी तो कविता प्रतिध्वनित होने के लिए अपने वलयों में फैल रही है। कई चित्र उभर रहे हैं। लेकिन पूरी बात बाद में। कविता की रेखाएँ वैसे ही खिंचती जा रही हैं जैसे सफेद बगुलों की उड़ान के बाद आसमान में कंपन और परों की फड़फड़ाहट उनके ओझल हो जाने बाद देर तक दिखाई भी देती रहती है... और सुनाई भी। बहुत अच्छी कविता।

सुशील कृष्ण गोरे
मुंबई

harpreet ने कहा…

पार करता हूँ वह नदी,वही नदी
तट का बालू हमारे बीच
उसके नाम से बुला बैठता हूँ तुम्हे


सुन्दर पंक्तियाँ

ज्योत्स्ना पाण्डेय ने कहा…

अरुण जी!
"उसके नाम से बुला बैठता हूँ तुम्हें,
इस प्रेम में उस प्रेम की शुरुआत.."

एक मोहक पीड़ा स्पंदित हो रही है इन पंक्तियों में....
सुन्दर भावाभिव्यक्ति!

विमलेश त्रिपाठी ने कहा…

बेहद मार्मिक कविता। बधाई...

पारुल "पुखराज" ने कहा…

"उसके नाम से बुला बैठता हूँ तुम्हे"…बेख़्याली…

जैसे इमरोज़ की पीठ पर साहिर का नाम उकेरती अमृता की उँगलियां …

दीप ने कहा…

bahut sundar
achhi prastuti

kaboolnama ने कहा…

सुंदर अति सुंदर मित्र

रश्मि प्रभा... ने कहा…

तुम्हारे साथ कोई तुम सा याद आता है...komal ehsaason ka ek srot ...
apni rachna सिसिफस vatvriksh ke liye bhejen rasprabha@gmail.com per parichay,tasweer, blog link ke saath

http://urvija.parikalpnaa.com/

सुनील गज्जाणी ने कहा…

पार करता हूँ वह नदी,वही नदी
तट का बालू हमारे बीच
उसके नाम से बुला बैठता हूँ तुम्हे

इस प्रेम में उस प्रेम की शुरुआत.बहुत सुन्दर कविता ,\
अरुण जी .खासकर ये पंक्तियाँ .

मुक्ताभ ने कहा…

"is apanapan me" ki jagah "is apnepan me" jyada best rahega.

अरुण देव ने कहा…

मुक्ताभ जी... बिलकुल ठीक कहा आपने... अब यह ज्यादा बेहतर हुआ है... बहुत बहुत आभार.

दीपक 'मशाल' ने कहा…

Aapki baaki kavitaaon se ye kavita kam se kam mujhe to kuchh kamzor lagi.. sorry :(

नीरज गोस्वामी ने कहा…

आपको पढना एक सुखद अनुभव से गुजरने जैसा है...शब्द और भाव का बेजोड़ संगम है आपकी रचना में...पारुल जी का धन्यवाद जिनके ब्लॉग ने आपका पता दिया...

नीरज

रंजना ने कहा…

वाह...अतिसुन्दर...

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

पार करता हूँ वह नदी,वही नदी
तट का बालू हमारे बीच
उसके नाम से बुला बैठता हूँ तुम्हे
इस प्रेम में उस प्रेम की शुरुआत...

बहुत सुन्दर कविता हैं आपकी और ब्लॉग भी बेहद सुन्दर ... आज आपकी पोस्ट समालोचना ब्लॉग में देखी .. पाब्लो नेरुदा की कविताओं का हिंदी में अनुवाद
अपर्णा जी द्वारा .. मै वह पोस्ट और आपकी यह कविता कल (२५ फरवरी २०११ )चर्चामंच पर रख रही हूँ .,.. आपका आभार इन सुन्दर रचनाओ और पोस्ट के लिए ..
http://charchamanch.blogspot.com

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूबसूरत रचना

वन्दना ने कहा…

बडी गहन अभिव्यक्ति है…………उम्दा ख्याल्।

Mita Das ने कहा…

is prem me prem ki udasiyan........sundar alfasj.......khoob likhte ho.....