शुक्रवार, 25 फरवरी 2011

कोई तो जगह हो



कोई तो जगह हो


कहाँ हो तुम
मन के घने वन में पुकारता हूँ
यह पुकार जो अनंत कामनाओं का अक्षत जंगल है

एक कामना अपने को खो देने की

सुन रही हो
इस आवाज़ के एक सिरे पर तुम अब भी चुप हो अपने अरण्य में गुम

हम दोनों के बीच
हम दोनों के लिए कोई तो जगह होगी.



9 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

हम दोनों के बीच हम दोनों के लिए कोई तो जगह होगी...
jane kitni sari bhawnayen hain is madhy me, bahut hi achha laga aapko padhna

Atul Shrivastava ने कहा…

अच्‍छी रचना। बधाई हो आपको।

सुनील गज्जाणी ने कहा…

arun jee ,
namaste !
sunder baav liye .achchi kavita , sadhuwad .
saadar

Mita Das ने कहा…

koi to jagah ho.......

बेनामी ने कहा…

ham dono ke bich ham dono ke liye koyi to jagah hogi .....bhut sundar arun

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

गहन विचार .

.हम दोनों के बीच हम दोनों के लिए कोई तो जगह होगी.

सोच अच्छी लगी

anupama's sukrity ! ने कहा…

कहाँ हो तुम मन के घने वन में पुकारता हूँयह पुकार जो अनंत कामनाओं का अक्षत जंगल है

अरुण देव जी नमस्कार .
आपकी कविता बहुत सुंदर है |मैंने नयी-पुरानी हलचल पर उसे लिया है|कृपया आयें और अपने शुभ विचार दें |

http://nayi-purani-halchal.blogspot.com/
Thanks .
anupama tripathi.

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बेहतरीन लिखा है सर!

सादर

Richa ने कहा…

एक कामना अपने को खो देने की...nice line..