सोमवार, 21 मार्च 2011

छल





















छल
               
अगर मैं कहता हूँ किसी स्त्री से
तुम सुंदर हो

क्या वह पलट कर कहेगी
बहुत हो चुका तुम्हारा यह छल
तुम्हारी नज़र मेरी देह पर है
सिर्फ देह नहीं हूँ मैं

अगर मैंने कहा होता
तुम मुझे अच्छी लगती हो
तो शायद वह समझती कि उसे अच्छी बनी रहने के लिए
बने रहना होगा मेरे अनुकूल
और यह तो अच्छी होने की अच्छी – खासी सज़ा है

मित्र अगर कहूँ
तो वह घनिष्ठता कहाँ
जो एक स्त्री-पुरूष के शुरूआती आकर्षण में होती है
दायित्वविहीन इस संज्ञा से जब चाहूँ जा सकता हूँ बाहर
और यह हिंसा अंततः किसी स्त्री पर ही गिरेगी

सोचा की कह दूँ कि मुझे तुमसे प्यार है
पर कई बार यह इतना सहज नहीं रहता
बाज़ार और जीवन-शैली से जुडकर इसके मानक मुश्किल हो गए हैं
और अब यह सहजीवन की तैयारी जैसा लगता है
जो अंततः एक घेराबंदी ही होगी किसी स्त्री के लिए

अगर सीधे कहूँ
कि तुम्हरा आकर्षण मुझे
स्त्री-पुरूष के सबसे स्वाभाविक रिश्ते की ओर ले जा रहा है...
तो इसे निर्लज्जता समझा जायेगा
और वहah  कहेगी
इस तरह के रिश्ते का अन्त एक स्त्री के लिए पुरूष की तरह नही होता..

भाषा से परे
मेरी देह की पुकार को तुम्हारी देह तो समझती है
भाषा में तुम करती हो इंकार

और सितम कि भाषा भी चाहती है यह इंकार.



26 टिप्पणियाँ:

नवनीत पाण्डे ने कहा…

अगर सीधे कहूँ
कि तुम्हरा आकर्षण मुझे
स्त्री-पुरूष के सबसे स्वाभाविक रिश्ते की ओर ले जा रहा है...
तो इसे निर्लज्जता समझा जायेगा
और वह कहोगी
इस तरह के रिश्ते का अन्त एक स्त्री के लिए पुरूष की तरह नही होता..

बहुत सुंदर और गहन अनुभूति है अरुण जी!

Aparna Manoj Bhatnagar ने कहा…

ये जेंडर पाल्टिक्स है ..
इधर कई मनोवैज्ञानिकों के चिंतन को पढ़ा .. हर जगह यही जेंडर पाल्टिक्स .

आपको क्या लगता है - फ्रायड , जुंग या बिने , एडलर जिस मनोविज्ञान , मनोविश्लेषण की सिद्धान्तिकी हमारे हाथों में थमा गए हैं , वह एकांगी नहीं हैं ? जिस इड की बात को फ्रायड instincts के साथ जोड़ते हैं .. वह नारी के ऊपर कहीं लागू नहीं होता .. दोनों के अनुभव एक हो ही नहीं सकते . उनके अनुसार प्रेम भी इसी इड के अलावा और कुछ नहीं . जैसे भूख -प्यास हैं , वैसे ही प्रेम ..ये कोई instinct नहीं है . ये मात्र सहज आकर्षण भी नहीं है .
ये आकर्षण के बाद किसी स्थायित्व का स्थानापन्न है .

पर आपकी कविता इन जटिलताओं के बीच नारी मन और उसकी स्थिति को कह पायी है ...

Vimlesh Tripathi ने कहा…

भाषा से परे
मेरी देह की पुकार को तुम्हारी देह तो समझती है
भाषा में तुम करती हो इंकार

और सितम की भाषा भी चाहती है यह इंकार.

--- बहुत अच्छा लिखते हैं भाई आप... एक बहुत अच्छी कविता। बधाई...

Satish Chandra Satyarthi ने कहा…

पहली बार इस ब्लॉग पर आया..
बेहतरीन हैं आपकी रचनाएँ.....

रश्मि प्रभा... ने कहा…

is achhi post ki jitni taareef karun kam hai, bahya prabhaw se aatmsarvekshan bahut hi badhiyaa hai... rasprabha@gmail.com per ise vatvriksh ke liye bhejen parichay, tasweer blog link ke saath

मनोज पटेल ने कहा…

भाषा से परे
मेरी देह की पुकार को तुम्हारी देह तो समझती है
भाषा में तुम करती हो इंकार

बहुत अच्छी कविता.

नरेन्द्र व्यास ने कहा…

सच्चे और ईमानदार भावों से परिपूर्ण एक मुकम्मल और अत्युत्तम रचना के लिए अरुण जी को बधाई..! ढेरों शुभकामनाएँ ! नमन !

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत सुंदर और गहन अनुभूति है अरुण जी!
आपको और आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनाएं !

राम मुरारी ने कहा…

सोचा की कह दूँ कि मुझे तुमसे प्यार है
पर कई बार यह इतना सहज नहीं रहता
बाज़ार और जीवन-शैली से जुडकर इसके मानक मुश्किल हो गए हैं
...बाजार ने प्रेम को किस तरह से अपनी चपेट में लेकर उसे अपना हथियार बना लिया है, उसे अभिव्यक्त करती कविता... साथ ही ये कविता इस नए और बदलते दौर में स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलताओं की भी पड़ताल करती है... बहुत बढ़िया...

ana ने कहा…

bahut hi sundar likha hai .........abhar

RAJESHWAR VASHISTHA ने कहा…

अभिव्यक्ति में ताज़गी और चिंतन की अनेक अनछुई परते हैं..सुन्दर स्वाभाविक सी कविता..

सुशील कृष्ण गोरे ने कहा…

इस कविता में बार-बार संक्षिप्ति की अत्यावश्यकता खटकती है। वर्ना अरुण ने कविता के बेहद भीतर देह की महकती भाषा में एक ऐसी धारा बहायी है जिसका आकर्षण मोहाविष्ट करता है। दिक्कत है कि फिर भी उसकी छुअन से हम रीते रह जाते हैं। लगता है, एक अहसास है जो दूरस्थ है। यह दूरी बीच के अंतराल को महसूस करवाती है। कविता में आमंत्रण जरूर है; लेकिन कविता की ज़मीन उचटी। देह पर देर तक टिकाव कविता को एक आदिम चाहत का स्त्रीवाद के मुहावरे में फिर से पुनर्लेखन बनाता है। लेकिन दाद देता हूँ कि अरुण का कवि अपने भाषिक विन्यास में इतना सजग है कि कविता के गगन को अर्थ की गोधूलि में भी धूसर नहीं होने दिया है। अरुण कुछ भी हो तुम्हारा काम-कविता दोनों है बहुत शानदार.....जो हमसे तुम पर फ़ख्र करवाता है।

त्रिपुरारि कुमार शर्मा ने कहा…

शुरुआत से बहुत अच्छी लगी मगर आख़िर में आकर एक मुक़्क़मल अंत नहीं है... मुआफ़ कीजिएगा!

' मिसिर' ने कहा…

बाज़ार और जीवन-शैली से जुडकर इसके मानक मुश्किल हो गए हैं
और अब यह सहजीवन की तैयारी जैसा लगता है
जो अंततः एक घेराबंदी ही होगी किसी स्त्री के लिए

सच, कितना कठिन हो गया है किसी से कहना कि--
मुझे तुमसे प्यार है ,
एह निश्छलता कितने संदेहों के घेरे में घिर
चुकी है आज !

बहुत सुन्दर और विचारणीय कविता !

उत्‍तमराव क्षीरसागर ने कहा…

अच्‍छी कवि‍ता...थोड़ी शुष्‍कता...मुझे लगता है बात अभी पूरी नहीं हुई...एक कवि‍ का मनोवि‍श्‍लेषण और आगे जा सकता है (आपके भीतर का तार्कि‍क संवाद चाहि‍ए)....।.

Ram Murari ने कहा…

सोचा की कह दूँ कि मुझे तुमसे प्यार है
पर कई बार यह इतना सहज नहीं रहता
बाज़ार और जीवन-शैली से जुडकर इसके मानक मुश्किल हो गए हैं
...
बाजार ने प्रेम को किस तरह से अपनी चपेट में लेकर उसे अपना हथियार बना लिया है, उसे अभिव्यक्त करती कविता... साथ ही... ये कविता इस नए और बदलते दौर में स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलताओं की भी पड़ताल करती है... बहुत बढ़िया कविता.

Maya Mrig ने कहा…

यह छल हर स्‍त्री की अभिलाषा है...हर पुरुष की नियति....मुक्ति ना छल में है ना छलरहित होकर....

अभिषेक आर्जव ने कहा…

"और सितम की भाषा भी चाहती है यह इंकार"


इस पंक्ति की प्रासंगिकता समझ नहीं आयी !

बेनामी ने कहा…

man ko chuti kavtaye

बेनामी ने कहा…

love does not claim possession but gives freedom. nice poem.

शालिनी कौशिक ने कहा…

charcha manch se aapke blog par aana hua.yahan aakar vastav me dekha ki ek gahan anubhuti ka ye blog abhi tak hamari pahunch se kitna door tha kafi afsos hua apnee pahunch par ,par ab khushi hai ki yahan pahunch gaye ab gahan anubhuti kee abhivyakti se jud sakenge.aabhar..

रश्मि प्रभा... ने कहा…

सोचा की कह दूँ कि मुझे तुमसे प्यार है
पर कई बार यह इतना सहज नहीं रहता
बाज़ार और जीवन-शैली से जुडकर इसके मानक मुश्किल हो गए हैं
और अब यह सहजीवन की तैयारी जैसा लगता है
जो अंततः एक घेराबंदी ही होगी किसी स्त्री के लिए
..........................हर दृष्टिकोण की व्याख्या में दम है

वन्दना ने कहा…

बेहतरीन कृति……………स्त्री के हर रूप को समेट दिया यहाँ तक कि उसके अन्तस्थ को भी……………शानदार्।

anupama's sukrity ! ने कहा…

गहन अभिव्यक्ति |आज के युग में प्रेम का विश्लेषण करती बेहतरीन रचना ...

leena malhotra ने कहा…

shabdo ne aise chitr kheenche, chitro ne aise rang bikhere, rango ne aisi anubootiya jagai, anubhootiyon ne prem ke naye aayam chhoo liye. badhai leena malhotra http://lee-mainekahablogspot.com/

मीनाक्षी ने कहा…

स्त्री पुरुष की सोच को गहराई से रेखांकित किया...अपने आप में प्रभावशाली सम्पूर्ण रचना..