तुम्हारे जन्म दिन पर
तुम्हारे सुर्ख होंठों के लिए गुलाब
तुम्हारे सयाह लम्बे बालों के लिए लम्बी रातें तारों से भरी टिमटटिमाती हुई
तुम्हारे आगोश की नर्म घास पर ओस का गीलापन
तुम्हारी आँखों के लिए ...
नहीं..... नहीं
उस जैसा कुछ भी तो नहीं
तुम्हारे कांपते ज़िस्म को ढक लेता हूँ
अपनी चाहत की चादर से
तुम्हारी देह के लिए
मेरी देह मदिर और उत्सुक
तुम्हारे लिए
इस जन्म दिन पर
मैं जलाना चाहता हूँ अधिकतम १८ मोमबतियां
तुम्हारी उम्र मेरे लिए वही कहीं आस – पास ठहर गई है..
१८ की उस याद के लिए
वह आइसक्रीम .
देखो अब यह जितनी भी रह गई है समय की आंच से पिघलती हुई
देखो अब यह जितनी भी रह गई है समय की आंच से पिघलती हुई
तुम्हारी नर्म हथेलिओं के लिए
मैं खरगोश बन जाता हूँ
अपनी चमकीली आँखों से तुम्हें निहारता हुआ वह लड़का
तुम्हें याद है
अपनी एटलस साइकिल से जो कई चक्कर लगा लेता था तुम्हारे घर का
रोज़ ही
तुम्हारे घर के सामने से तेज़ घंटी बजाता हुआ
इस जन्म दिन पर
क्यों न केवल तुम रहो
सिर्फ तुम
और मैं अपने मैं को छोड़ कर बैठा रहूँ तुम्हारे पास
जब तक बुझ न जाएँ तारें.....

25 टिप्पणियाँ:
इस जन्म दिन पर
क्यों न केवल तुम रहो
सिर्फ तुम
और मैं अपमे मैं को छोड़ कर बैठा रहूँ तुम्हारे पास
जब तक बुझ न जाएँ तारें.....
ये तो अनूठा जन्मदिन है .. बेहद सुन्दर . तारे न बुझें और जन्मदिन चलता रहे .
love is an endless mystery for it has nothing to explain it. bhut sundar arun
जन्मदिन मुबारक !!
तुम्हारी नर्म हथेलिओं के लिए
मैं खरगोश बन जाता हूँ
बहुत प्यारी कविता भाई...
bejor sir ji.
font ka rang ya background ka rang badal len, padhne mein dikkat aati hai
कोमल ! बहुत कोमल
बेहद ख़ूबसूरत कविता.. आभार आपका !
तुम्हारे लिए
इस जन्म दिन पर
मैं जलाना चाहता हूँ अधिकतम १८ मोमबतियां
तुम्हारी उम्र मेरे लिए वही कहीं आस – पास ठहर गई है..
tareef se upar
जन्मदिन मुबारक !!
१८ की उस याद के लिए
वह आइसक्रीम .
देखो अब यह जितनी भी रह गई है समय की आंच से पिघलती हुई
Bahut hi sundar rachana he...
pryatek pankti ke saath judaw aur bhi gaharaa hota chalaa jaata he....
दिल को छूती कल्पना!!!!!
अप्रतिम !!!
प्रेम का चरमोत्कर्ष..
तुम्हारी आँखों के लिए ...
नहीं..... नहीं
उस जैसा कुछ भी तो नहीं...........
बहुत सुन्दर,कोमल और हृदयस्पर्शी रचना !
जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें !
इस जन्म दिन पर
क्यों न केवल तुम रहो
सिर्फ तुम
और मैं अपमे मैं को छोड़ कर बैठा रहूँ तुम्हारे पास
जब तक बुझ न जाएँ तारें.....
काश ऐसा हो पाता मगर ये सब सिर्फ़ कविताओ या ख्वाब मे ही क्यों होता है………………वैसे भाव बहुत गहरे हैं सीधा दिल मे उतरते हैं।बधाई।
A romantic poem from Arun ji! I read it for the first time and liked too!
बहुत सुंदर। प्रेम की अभिव्यक्त कठिन है, लेकिन हो सकती है। अरुण की कविता अपने क्रमबद्ध दृश्यों के भीतरी लय में प्रतिष्ठित कविता है। उनकी एक खास कोण पर झुकी भाषा में कविता प्रेम की अकथ-कथा बन जाती है। सचमुच चमकीली आंखें ही सोच सकती हैं - तुम्हारे सयाह लम्बे बालों के लिए लम्बी रातें। बिंब पुराना लेकिन नए ढंग से अद्भुत। मदिर और उत्सुक देह में जगते प्रेम का असमाप्य आख्यान......मोहक।
is se sundar kavita nahi ho sakti na hi is se sundar janmdin.
kiska janamdin hai arun
शानदार ..... रूमानी कर गयी.....
बहुत सुन्दर कविता....उस पुरानी सी बात को कुछ नए से लहजे मे कहने की अद्भुत कोशिश.....बधाई.
तुम्हारे लिए
इस जन्म दिन पर
मैं जलाना चाहता हूँ अधिकतम १८ मोमबतियां
तुम्हारी उम्र मेरे लिए वही कहीं आस – पास ठहर गई है..
क्या बात है.... बहुत खूब, हमारी दुआ है एक क्या हर जन्म दिन पर आप 18 ही मोमबत्तियां लगाएं...
arun ji
janma din par kavitaa achhi hai,badhai.
Ramesh sharma(shaharnamaraigarh.blogspot.com)
अरुणजी, प्रेम की मीठी बारिश से मन भीग सा गया है, लगा कविता अनवरत चलती रहे.....बीता वक़्त हमेशा समीप ही रहता है यदि यादों का हृदय में नवीनीकरण होता रहे.....सचमुच मनमोहक अभिव्यक्ति है.....
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