बुधवार, 20 अप्रैल 2011

तुम्हारे जन्म दिन पर





















तुम्हारे जन्म दिन पर 


तुम्हारे सुर्ख होंठों के लिए गुलाब
तुम्हारे सयाह लम्बे बालों के लिए लम्बी रातें तारों से भरी टिमटटिमाती हुई
तुम्हारे आगोश की नर्म घास पर ओस का गीलापन

तुम्हारी आँखों के लिए ...
नहीं..... नहीं
उस जैसा कुछ भी तो नहीं

तुम्हारे कांपते ज़िस्म को ढक लेता हूँ                                  
अपनी चाहत की चादर से

तुम्हारी देह के लिए
मेरी देह मदिर और उत्सुक

तुम्हारे लिए
इस जन्म दिन पर
मैं जलाना चाहता हूँ अधिकतम १८ मोमबतियां
तुम्हारी उम्र मेरे लिए वही कहीं आस – पास ठहर गई है..         

१८ की उस याद के लिए
वह आइसक्रीम .
देखो अब यह जितनी भी रह गई है समय की आंच से पिघलती हुई 

तुम्हारी नर्म हथेलिओं के लिए
मैं खरगोश बन जाता हूँ


अपनी चमकीली आँखों से तुम्हें निहारता हुआ वह लड़का
तुम्हें याद है
अपनी एटलस साइकिल से जो कई चक्कर लगा लेता था तुम्हारे घर का
रोज़ ही
तुम्हारे घर के सामने से तेज़ घंटी बजाता हुआ

इस जन्म दिन पर
क्यों न केवल तुम रहो
सिर्फ तुम

और मैं अपने मैं को छोड़ कर बैठा रहूँ तुम्हारे पास
जब तक बुझ न जाएँ तारें.....






25 टिप्पणियाँ:

Aparna Manoj Bhatnagar ने कहा…

इस जन्म दिन पर
क्यों न केवल तुम रहो
सिर्फ तुम

और मैं अपमे मैं को छोड़ कर बैठा रहूँ तुम्हारे पास
जब तक बुझ न जाएँ तारें.....

ये तो अनूठा जन्मदिन है .. बेहद सुन्दर . तारे न बुझें और जन्मदिन चलता रहे .

बेनामी ने कहा…

love is an endless mystery for it has nothing to explain it. bhut sundar arun

मनोज पटेल ने कहा…

जन्मदिन मुबारक !!

विमलेश त्रिपाठी ने कहा…

तुम्हारी नर्म हथेलिओं के लिए
मैं खरगोश बन जाता हूँ

बहुत प्यारी कविता भाई...

सागर ने कहा…

bejor sir ji.

सागर ने कहा…

font ka rang ya background ka rang badal len, padhne mein dikkat aati hai

पारुल "पुखराज" ने कहा…

कोमल ! बहुत कोमल

Madhavi Sharma Guleri ने कहा…

बेहद ख़ूबसूरत कविता.. आभार आपका !

रश्मि प्रभा... ने कहा…

तुम्हारे लिए
इस जन्म दिन पर
मैं जलाना चाहता हूँ अधिकतम १८ मोमबतियां
तुम्हारी उम्र मेरे लिए वही कहीं आस – पास ठहर गई है..
tareef se upar

संजय भास्कर ने कहा…

जन्मदिन मुबारक !!

Nikhilesh Ladha 'snigdh' ने कहा…

१८ की उस याद के लिए
वह आइसक्रीम .
देखो अब यह जितनी भी रह गई है समय की आंच से पिघलती हुई

Bahut hi sundar rachana he...
pryatek pankti ke saath judaw aur bhi gaharaa hota chalaa jaata he....

Arpita ने कहा…

दिल को छूती कल्पना!!!!!

सुशीला पुरी ने कहा…

अप्रतिम !!!

गीता पंडित (शमा) ने कहा…

प्रेम का चरमोत्कर्ष..

' मिसिर' ने कहा…

तुम्हारी आँखों के लिए ...
नहीं..... नहीं
उस जैसा कुछ भी तो नहीं...........

बहुत सुन्दर,कोमल और हृदयस्पर्शी रचना !
जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें !

वन्दना ने कहा…

इस जन्म दिन पर
क्यों न केवल तुम रहो
सिर्फ तुम

और मैं अपमे मैं को छोड़ कर बैठा रहूँ तुम्हारे पास
जब तक बुझ न जाएँ तारें.....


काश ऐसा हो पाता मगर ये सब सिर्फ़ कविताओ या ख्वाब मे ही क्यों होता है………………वैसे भाव बहुत गहरे हैं सीधा दिल मे उतरते हैं।बधाई।

एम के मिश्र ने कहा…

A romantic poem from Arun ji! I read it for the first time and liked too!

सुशील कृष्ण गोरे ने कहा…

बहुत सुंदर। प्रेम की अभिव्यक्त कठिन है, लेकिन हो सकती है। अरुण की कविता अपने क्रमबद्ध दृश्यों के भीतरी लय में प्रतिष्ठित कविता है। उनकी एक खास कोण पर झुकी भाषा में कविता प्रेम की अकथ-कथा बन जाती है। सचमुच चमकीली आंखें ही सोच सकती हैं - तुम्हारे सयाह लम्बे बालों के लिए लम्बी रातें। बिंब पुराना लेकिन नए ढंग से अद्भुत। मदिर और उत्सुक देह में जगते प्रेम का असमाप्य आख्यान......मोहक।

बेनामी ने कहा…

is se sundar kavita nahi ho sakti na hi is se sundar janmdin.

बेनामी ने कहा…

kiska janamdin hai arun

डॉ .अनुराग ने कहा…

शानदार ..... रूमानी कर गयी.....

RAJESHWAR VASHISTHA ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता....उस पुरानी सी बात को कुछ नए से लहजे मे कहने की अद्भुत कोशिश.....बधाई.

वीना ने कहा…

तुम्हारे लिए
इस जन्म दिन पर
मैं जलाना चाहता हूँ अधिकतम १८ मोमबतियां
तुम्हारी उम्र मेरे लिए वही कहीं आस – पास ठहर गई है..

क्या बात है.... बहुत खूब, हमारी दुआ है एक क्या हर जन्म दिन पर आप 18 ही मोमबत्तियां लगाएं...

रमेश शर्मा ने कहा…

arun ji
janma din par kavitaa achhi hai,badhai.

Ramesh sharma(shaharnamaraigarh.blogspot.com)

ANJU SHARMA ने कहा…

अरुणजी, प्रेम की मीठी बारिश से मन भीग सा गया है, लगा कविता अनवरत चलती रहे.....बीता वक़्त हमेशा समीप ही रहता है यदि यादों का हृदय में नवीनीकरण होता रहे.....सचमुच मनमोहक अभिव्यक्ति है.....