बुद्ध
सुन्दर, लम्बा कद, नीची की हुई आँख वाला, स्मृतिशील
बत्तीस, लक्षणों से युक्त वह
राहुल, भद्रा कपिलायनी और महल से जब निकला
आषाढ़ की पूर्णिमा थी
‘गृहकारक मैंने तुम्हें पहचान लिया
तुम अब गृह का निर्माण नहीं कर सकते
टूट कर गिर गयी हैं कड़ियाँ और
ध्वस्त हो गया है शिखर’
लगभग दो हजार पाँच सौ उन्तीस वर्ष पहले
निरंजना नदी के किनारे की वह पहले पहर की रात
जब खो गये सारे रास्ते, रज भी शान्त हुआ, आस्रव रुद्ध हो चले
और तुमने कहा कि दुख का भी अन्त हुआ
महापरिनिर्वाण से पूर्व
कुशीनारा के शाल वन में
शास्ता ने प्रिय शिष्य आनन्द से कहा-
सत्य के साथ रखना तर्क
भोग के साथ अप्रमाद, अतियों से बचना
यह एक नदी थी करुणा की
जो हर बार नयी थी
धोये इसने युद्धों के कल्मष
यहाँ ईश्वर ऐसे था जैसे नहीं था
इस महोत्सव की चमकीली आत्मा पर आतंक नहीं था
सत्य के अकेले पाठ का
यह नदी बहती रही
इतिहास के शुष्क पन्ने नम रहे इसकी आर्द्रता से
एक सुबह
दो सौ गायों के रक्त में सनी उस मूर्ति के टुकड़े बटोरने
जब सूर्य निकला
अफग़ानिस्तान के बामियान में
वृद्ध बुद्ध और युवा आनन्द
साफ कर रहे थे रास्ता जो रुँधा पड़ा था
भय, अज्ञान और घृणा से.
(क्या तो समय)
12 टिप्पणियाँ:
लगभग दो हजार पाँच सौ उन्तीस वर्ष पहले
निरंजना नदी के किनारे की वह पहले पहर की रात
जब खो गये सारे रास्ते, रज भी शान्त हुआ, आस्रव रुद्ध हो चले
और तुमने कहा कि दुख का भी अन्त हुआ
prashansa karun yaa manan ... prabuddh rachna
इस कविता को पुस्तक में जब-तब पढ़ लेते हैं . आज के सीलन भरे युग में ये कविता सांत्वना देती है . निराश मन में आशा का संचार करती है . अरुण , आपके पास कविता का ऐसा मुहावरा है जो जादूगरी करता है . उँगलियों में जैसे संगीत बसा है या दुनिया भर की वह संवेदना जो बिरले ही कहीं देखने को मिलती है . बुद्ध पूर्णिमा की शुभकामनाओं के साथ ..
सुन्दर, लम्बा कद, नीची की हुई आँख वाला, स्मृतिशील ...
खूब याद आये बुद्ध, युद्ध और आज !
जब भी आपको पढ़ा एक अलग आनंद मिश्रित विस्मय के घेरे में मैं आवृत होती गयी आज भी वैसा ही....
आभार
सस्नेह
गीता
सत्य के अकेले पाठ का
यह नदी बहती रही
इतिहास के शुष्क पन्ने नम रहे इसकी आर्द्रता से...................देव (अरुण ) ....रिदयंगम शाब्दिक तस्वीर आप की इस बार भी परिपूर्ण ले के सतह .....बहुत बधाई सर जी
Nirmal Paneri
अच्छा लगा आओ, मिल कर करुणा खोजें.....
बुद्ध हमारी रचनात्मक संवेदना मे स्फूर्ति भरने वाले आदि महापुरुष है। वो सबसे पहले चिंतक हैं जो मनुष्य के दुख और दुख के कारण की विवेचना करते हैं। बधाई अरुण जी इस कविता के लिए और बुद्ध पूर्णिमा के इस अवसर पर सभी दोस्तो को शुभकामनाएँ।
करुणा की वह नदी
निरंजना
चलती रही
तुम्हारे पावों के साथ ,
तथागत !
देख लो
हर बूँद पर
धंम्ममम शरणम
का प्रवाह ...!!!
.......... बुद्ध पूर्णिमा की बधाइयाँ !
एक सुबह
दो सौ गायों के रक्त में सनी उस मूर्ति के टुकड़े बटोरने
जब सूर्य निकला
अफग़ानिस्तान के बामियान में
वृद्ध बुद्ध और युवा आनन्द
साफ कर रहे थे रास्ता जो रुँधा पड़ा था
भय, अज्ञान और घृणा से.
उत्कृष्ट रचना .....निशब्द करते हैं कविता के शब्द
arun jee
namaskaar ! aap ne pure ek kaal kahnd ko saakshat kar diyaa . ek cintan . manan kare wali rachna ke liye sadhuwad . behad sunder gambheer .
saadar
ati sundar
बहुत सुंदर..!!!
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