
छल्ला
छल्ले में लटकी थी चाभी
छल्ले को चाभी की ऐसी आदत
जब चाभी मांगता छल्ला साथ - साथ चला आता
छल्ले के बिना गुम जाए फिर भी कभी चाभी
अकेले छल्ले का क्या
मिले-न–मिले
रहे–न–रहे
चाभी जब खोलती है ताला
डूब कर तन्मय
छल्ला करता रहता इन्तज़ार
फिर चाभी निकल आती उसी के सहारे
जैसे कुएं से भर कर पानी
बाल्टी आ जाए रस्सी चढ़-चढ़ कर
खिटपिट करती चाभियां
पर रहती साथ ही
छल्ले के पास संदेशों के कई बुशर्ट
चाभियाँ एक रंगी
ऊँची-नीची दांतों वाली
रहस्य के तिलिस्म में चाभियां तितली की तरह बैठती हैं
तो लौट आती हैं छल्ले के घोंसले में चिड़ियों की तरह चीं चीं करतीं.
13 टिप्पणियाँ:
चाभी जब खोलती है ताला
डूब कर तन्मय
छल्ला करता रहता इन्तज़ार
फिर चाभी निकल आती उसी के सहारे
जैसे कुएं से भर कर पानी
बाल्टी आ जाए रस्सी चढ़-चढ़ कर
bahut hi behtareen khyaal
contact me at rasprabha@gmail.com
छल्ले के बिना गुम जाए फिर भी कभी चाभी
अकेले छल्ले का क्या
मिले-न–मिले
रहे–न–रहे ...
चाभी जब खोलती है ताला
डूब कर तन्मय
छल्ला करता रहता इन्तज़ार
फिर चाभी निकल आती उसी के सहारे
जैसे कुएं से भर कर पानी
बाल्टी आ जाए रस्सी चढ़-चढ़ कर....
sochne ko majboor karti kavita.. badhai!
बेहद गहन अभिव्यक्ति।
i am buring with curiosity.nice yar.fir mujhe deede e tar yaad aaya.
रहस्य के तिलिस्म में चाभियां तितली की तरह बैठती हैं
तो लौट आती हैं छल्ले के घोंसले में चिड़ियों की तरह चीं चीं करतीं......वाह बहुत खूब कही है सर ...सुन्दर शाब्दिक अभिव्यक्ति !!!!!!!!!!!
बहुत ही अच्छी कविता है अरुण। बधाई।इन दिनों तुम्हारा संकलन भी पढ़ रहा हूं और प्रभावित हो रहा हूँ।
छल्ले के बिना गुम जाए फिर भी कभी चाभी
अकेले छल्ले का क्या
मिले-न–मिले
रहे–न–रहे ...
चाभी जब खोलती है ताला
डूब कर तन्मय
छल्ला करता रहता इन्तज़ार
क्या कहूँ आपकी हर रचना ने मोहित किया है ...
आपका संकलन पढ़ने का मन है...अरुण जी...
रहस्य के तिलिस्म में चाभियां तितली की तरह बैठती हैं
अनेक अर्थ गहती कविता..
बधाई...
आपका स्वागत है "नयी पुरानी हलचल" पर...यहाँ आपके ब्लॉग की किसी पोस्ट की कल होगी हलचल...
नयी-पुरानी हलचल
धन्यवाद!
बेहद ही गहरे भाव अभिव्यक्ति के साथ वैसे ही गुंथे हैं जैसा छल्ले में चाभी. शुभकामनायें !
उम्दा ख्याल..!!
बहुत ही अच्छी कविता
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