आदम की दुनिया
भीड़ में गुम गया
है आदम
न जाने आदम ने कैसा बनाया है अपना यह स्वर्ग
खोई हुई
हव्वा को खोजते हुए
हर स्त्री
में वह स्मृति की तरह रह गई हव्वा के पास जाता है
और उसकी
संभावना में एक आदम की तरह खटखटाता है सांकल
बजाता है
घंटी
पुकारता है
वही राग
जिसे पहली
बार गुनगुनाया था उसने हव्वा को रिझाने के लिए
अपने वंश
वृक्ष के इस जंगल में
आदम से आदमी
बनते बनते वह कितना बदल गया है
इसका ठीक ठीक
इल्म उस हव्वा को होगा जिसकी तलाश में है वह
शायद उस सेब
को होगा पता
जिसकी मिठास
पुरा कथाओं से बह कर आती है अभी भी
ईश्वर के
साम्राज्य से बहिष्कृत
अपनी नश्वरता
के उद्यान में उसने खिलाएं प्रणय के फूल
गाये अपनी अमरता के गीत
अब भी
जब कभी उमगते
बेटों-बेटिओं में वह सुनता है हरे पत्तों की सरसराहट
उसके रक्त
में धरती की पहली फसल की महक समा जाती है
इधर हव्वा और
आदम के धागे उलझ गए हैं
उनके रास्ते
में आ गया है वही ईश्वर
उन पर रखता
है नज़र
हव्वा को खोजते खोजते उसने देखे
अपनी बेटिओं के लटके हुए शव, झुलसे हुए चेहरे
प्रेम विहीन दाम्पत्य में उन्हें घुटते हुए
न जाने आदम ने कैसा बनाया है अपना यह स्वर्ग
जहां से अब बहिष्कृत
होने के रास्ते भी बंद हैं.

17 टिप्पणियाँ:
न जाने कैसा बनाया है उसने अपना यह स्वर्ग
जहां से अब बहिष्कृत होने के रास्ते भी बंद हैं.....
prem vihin dampaty mein apni betiyon ke shav dekhna .. bahut marmik hai. ekdam marak kavita... krantikari... thought provoking.. congrats!
अब भी जब कभी उमगते बेटों-बेटिओं में वह सुनता है हरे पत्तों की सरसराहट उसके रक्त में धरती की पहली फसल की महक समा जाती है ... bahut badhiya likha hai
इधर हव्वा और आदम के धागे उलझ गए हैं
उनके रास्ते में आ गया है वही ईश्वर
उन पर रखता है नज़र .....
बहुत खूब अरुण जी! बहुत ही अच्छी पंक्तियां है
bahut khoob, insan ki azli kahani jo hamesha se chali aa rahi hai, aur hamesh chalti rahegi.
insan ki wahi azli kahani, hamesha se chali a rahi hai aur chalti rahege. baqaul Khumar Barabankvi, Na hara hai ishq na hari hai duniya, diya jal raha hai hava chal rahi hai.
namaskaar !
achchi kavita . ek bodhparak abhivyakti . badhai
sadhuwad
stri -purush ke rishte ko aadm -havva ke prtik se jivnt kr dene vali kavita.es rahasy ko samjhte hi sare vimrsh jhuthe pad jayenge.
achchhi kavita ke liye badhai arun jee
बहुत सुन्दर विश्लेषणात्मक चिन्तन्।
वही वर्जना जीने नहीं देती .....लय से सवाल करती अच्छी कविता
कविता इस सोंच पर लाती है --क्या मानव इतिहास की तरह मानवीय गुणों का इतिहास नहीं लिखा जाना चाहिए ?
अपने वंश वृक्ष के इस जंगल में
आदम से आदमी बनते बनते वह कितना बदल गया है
इसका ठीक ठीक इल्म उस हव्वा को होगा जिसकी तलाश में है वह
bhut hi sunder rachna hai. aadam aur huwa hmare vitar hi hai. aapki kavitawo me aag hai. ye sulgta rahe. meri suvkamnaye.
बहुत सुन्दर विश्लेषणात्मक चिन्तन्।
behatareen kavita hai
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एक दम सही कविता.
और एक दम सही प्रतिक्रिया कि ......*मानवीय गुणों का इतिहास लिखा जाना चाहिये * सटीक. संतुष्ट !
आज कल आदम हव्वा की संवेदना को बाज़ार ने निगल लिया है ,बहुत अच्छी कविता ,शानदार
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