शनिवार, 9 जुलाई 2011

आदम की दुनिया



आदम की दुनिया 

भीड़ में गुम गया है आदम
खोई हुई हव्वा को खोजते हुए

हर स्त्री में वह स्मृति की तरह रह गई हव्वा के पास जाता है
और उसकी संभावना में एक आदम की तरह खटखटाता है सांकल
बजाता है घंटी
पुकारता है वही राग
जिसे पहली बार गुनगुनाया था उसने हव्वा को रिझाने के लिए

अपने वंश वृक्ष के इस जंगल में
आदम से आदमी बनते बनते वह कितना बदल गया है
इसका ठीक ठीक इल्म उस हव्वा को होगा जिसकी तलाश में है वह

शायद उस सेब को होगा पता
जिसकी मिठास पुरा कथाओं से बह कर आती है अभी भी

ईश्वर के साम्राज्य से बहिष्कृत
अपनी नश्वरता के उद्यान में उसने खिलाएं प्रणय के फूल
गाये अपनी अमरता के गीत

अब भी
जब कभी उमगते बेटों-बेटिओं में वह सुनता है हरे पत्तों की सरसराहट
उसके रक्त में धरती की पहली फसल की महक समा जाती है

इधर हव्वा और आदम के धागे उलझ गए हैं
उनके रास्ते में आ गया है वही ईश्वर
उन पर रखता है नज़र


हव्वा को खोजते खोजते उसने देखे
अपनी बेटिओं के लटके हुए शव, झुलसे हुए चेहरे
प्रेम विहीन दाम्पत्य में उन्हें घुटते हुए


न जाने आदम ने  कैसा बनाया है अपना यह स्वर्ग
जहां से अब बहिष्कृत होने के रास्ते भी बंद हैं.










17 टिप्पणियाँ:

aparna manoj ने कहा…

न जाने कैसा बनाया है उसने अपना यह स्वर्ग
जहां से अब बहिष्कृत होने के रास्ते भी बंद हैं.....
prem vihin dampaty mein apni betiyon ke shav dekhna .. bahut marmik hai. ekdam marak kavita... krantikari... thought provoking.. congrats!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

अब भी जब कभी उमगते बेटों-बेटिओं में वह सुनता है हरे पत्तों की सरसराहट उसके रक्त में धरती की पहली फसल की महक समा जाती है ... bahut badhiya likha hai

नवनीत पाण्डे ने कहा…

इधर हव्वा और आदम के धागे उलझ गए हैं
उनके रास्ते में आ गया है वही ईश्वर
उन पर रखता है नज़र .....
बहुत खूब अरुण जी! बहुत ही अच्छी पंक्तियां है

Rizvanul Haque ने कहा…

bahut khoob, insan ki azli kahani jo hamesha se chali aa rahi hai, aur hamesh chalti rahegi.

Rizvanul Haque ने कहा…

insan ki wahi azli kahani, hamesha se chali a rahi hai aur chalti rahege. baqaul Khumar Barabankvi, Na hara hai ishq na hari hai duniya, diya jal raha hai hava chal rahi hai.

सुनील गज्जाणी ने कहा…

namaskaar !
achchi kavita . ek bodhparak abhivyakti . badhai
sadhuwad

Ranjana Jaiswal ने कहा…

stri -purush ke rishte ko aadm -havva ke prtik se jivnt kr dene vali kavita.es rahasy ko samjhte hi sare vimrsh jhuthe pad jayenge.
achchhi kavita ke liye badhai arun jee

वन्दना ने कहा…

बहुत सुन्दर विश्लेषणात्मक चिन्तन्।

कैलाश वानखेड़े ने कहा…

वही वर्जना जीने नहीं देती .....लय से सवाल करती अच्छी कविता

' मिसिर' ने कहा…

कविता इस सोंच पर लाती है --क्या मानव इतिहास की तरह मानवीय गुणों का इतिहास नहीं लिखा जाना चाहिए ?

khusi ने कहा…

अपने वंश वृक्ष के इस जंगल में
आदम से आदमी बनते बनते वह कितना बदल गया है
इसका ठीक ठीक इल्म उस हव्वा को होगा जिसकी तलाश में है वह
bhut hi sunder rachna hai. aadam aur huwa hmare vitar hi hai. aapki kavitawo me aag hai. ye sulgta rahe. meri suvkamnaye.

vishy ने कहा…

बहुत सुन्दर विश्लेषणात्मक चिन्तन्।

Ehsaas ने कहा…

behatareen kavita hai


http://teri-galatfahmi.blogspot.com/

web hosting india ने कहा…

I definitely enjoying every little bit of it I have you bookmarked to check out new stuff

web hosting india ने कहा…

It's great stuff. I enjoyed to read this blog.

अजेय ने कहा…

एक दम सही कविता.
और एक दम सही प्रतिक्रिया कि ......*मानवीय गुणों का इतिहास लिखा जाना चाहिये * सटीक. संतुष्ट !

परितोष ने कहा…

आज कल आदम हव्वा की संवेदना को बाज़ार ने निगल लिया है ,बहुत अच्छी कविता ,शानदार