रविवार, 28 अगस्त 2011

स्मृतियाँ





















स्मृतियाँ

बुझे हुए दिनों की लपट भी जलाती है
  
सर्द रात में अपमान से भीगा वह भारी कम्बल
जिसके चुभन के निशान अभी भी हैं

प्रतिहिंसा की कड़वी चाय आज फिर पीने बैठा हूँ
कई बार सोचा आत्मघात के बारे में 
मैं हत्यारा होते होते रह गया  
चलने से रह गई वह बारूद, मेरे नथुनों में अभी भी है

कोयले से राख हटाता हूँ
थरथराती वह लपट फिर दिख जाती है

वह लपलपाती हुई धार
जो वर्षों से पी रही है मेरा ही रक्त

स्मृतियाँ
पिंजड़े की उस चिडिया की तरह हैं
जब-जब बाहर आती हैं 
खरोंच और चोट लिए आती हैं.



6 टिप्पणियाँ:

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

गहन ..गंभीर उदगार ह्रदय के...

पारुल "पुखराज" ने कहा…

वेदना संगिनी लौट आई पुन:...

कविता मन में देर तक गूंजेगी अरुण जी

रश्मि प्रभा... ने कहा…

सर्द रात में अपमान से भीगा वह भारी कम्बल
जिसके चुभन के निशान अभी भी हैं
jisse poora shareer akadta hai

डॉ .अनुराग ने कहा…

कई बार सोचा आत्मघात के बारे में
मैं हत्यारा होते होते रह गया

dilchasp...

khusi ने कहा…

acchi kavita hai

Meena Chopra ने कहा…

gahan aur talwar ki dhar si.