स्मृतियाँ
बुझे हुए दिनों की लपट भी जलाती है
सर्द रात में अपमान से भीगा वह भारी कम्बल
जिसके चुभन के निशान अभी भी हैं
प्रतिहिंसा की कड़वी चाय आज फिर पीने बैठा हूँ
कई बार सोचा आत्मघात के बारे में
मैं हत्यारा होते होते रह गया
चलने से रह गई वह बारूद, मेरे नथुनों में अभी भी है
कोयले से राख हटाता हूँ
थरथराती वह लपट फिर दिख जाती है
वह लपलपाती हुई धार
जो वर्षों से पी रही है मेरा ही रक्त
स्मृतियाँ
पिंजड़े की उस चिडिया की तरह हैं
जब-जब बाहर आती हैं
पिंजड़े की उस चिडिया की तरह हैं
जब-जब बाहर आती हैं
खरोंच और चोट लिए आती हैं.

6 टिप्पणियाँ:
गहन ..गंभीर उदगार ह्रदय के...
वेदना संगिनी लौट आई पुन:...
कविता मन में देर तक गूंजेगी अरुण जी
सर्द रात में अपमान से भीगा वह भारी कम्बल
जिसके चुभन के निशान अभी भी हैं
jisse poora shareer akadta hai
कई बार सोचा आत्मघात के बारे में
मैं हत्यारा होते होते रह गया
dilchasp...
acchi kavita hai
gahan aur talwar ki dhar si.
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