मंगलवार, 6 सितम्बर 2011

पत्नी के लिए



















पत्नी के लिए

वह आंच नहीं हमारे बीच
जो झुलसा देती है
वह आवेग भी नही जो कुछ और नहीं देखता
तुम्हारा प्रेम जलधार जैसा   

तुम्हारा प्रेम बरसता है
और कमाल की जैसे खिली हो धूप

तुम्हारा घर
प्रेम के साथ-साथ थोड़ी दुनियावी जिम्मेदारिओं से बना है
कभी आंटे का खाली कनस्तर बज जाता है
तो कभी बिटिया के इम्तहान का  रिपोर्ट कार्ड बांचने बैठ जाती हो

तुम्हारे आंचल से कच्चे दूध की गंध आती है
तुम्हारे भरे स्तनों पर तुम्हारे शिशु के गुलाबी होंठ हैं
अगाध तृप्ति से भर गया है उसका चेहरा
मुझे देखता पाकर आंचल से उसे ढँक लेती हो
और कहती हो नज़र लग जाएगी
शायद तुमने पहचान लिया है मेरी ईर्ष्या को  

बहुत कुछ देखते हुए भी नहीं देखती तुम
तुम्हारे सहेजने से है यह सहज

तुम्हारे प्रेम से ही हूँ इस लायक कि कर सकूँ प्रेम

कई बार तुम हो जाती हो अदृश्य जब
भटकता हूँ किसी और स्त्री की कामना में
हिस्र पशुओं से भरे वन में

लौट कर जब आता हूँ तुम्हारे पास
तुम में ही मिलती ही वह स्त्री
अचरज से भर उसके नाम से तुम्हें पुकारता हूँ

तुम विहंसती हो और कहती हो यह क्या नाम रखा तुमने मेरा.










'पत्नी के लिए’ कविता को लेकर फेसबुक के ग्रुप ‘कविओं की पृथ्वी’ में लंबा संवाद चला. लगभग २०० के आस पास प्रतिक्रियाएं आईं. स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों पर यह बातचीत अर्थगर्भित है. इससे स्त्री और पुरुष दोनों की मानसिकता और मनोविज्ञान पर प्रकाश पड़ता है. कविता की भूमिका और उसके प्रभाव का भी पता चलता है. फेसबुक के बाहर के मित्रों ने यह बहस देखने की इच्छा प्रकट की है. उनके लिए  
 ::





45 टिप्पणियाँ:

अपर्णा मनोज ने कहा…

कितनी ईमानदार कविता है ये ..
पत्नी की सरलता , उसका सहज प्रेम , कुछ दुनियावी रंगों से भरी उसकी व्यस्तता .. और पत्नी में उस स्त्री को देखना ..
एक बोल्ड कविता है ..
कहीं पत्नी से प्रेम करती और उसकी सहजता पर एक छुपी माफ़ी मांगती ..

pradeep saini ने कहा…

तुम्हारे प्रेम से ही हूँ इस लायक कि कर सकूँ प्रेम......bahut khub...

जनविजय ने कहा…

अरुण जी, बेहद अच्छी कविता है। कविता ऐसी ही होनी चाहिए। मेरी शुभकामनाएँ। सादर

Ashish Pandey "Raj" ने कहा…

बहुत कुछ देखते हुए भी नहीं देखती तुम
तुम्हारे सहेजने से है यह सहज...
तुम में ही मिलती ही वह स्त्री....

नारी तुम केवल श्रद्धा हो ...
आभार

ANJU SHARMA ने कहा…

कई बार तुम हो जाती हो अदृश्य जब भटकता हूँ किसी और स्त्री की कामना में हिस्र पशुओं से भरे वन में .......संवेदनाओं से भरी एक ईमानदार अभिव्यक्ति जो कभी दिल छू लेती है तो कभी आश्चर्य से भर देती है......सुंदर रचना के लिए बधाई....

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

निश्छल ....स्पष्ट भाव मन के ...
समर्पण का भाव कुछ छुपा-छुपा सा प्रकट हो रहा है ...
दे रहा है एक अद्भुत सौन्दर्य कविता को ...
बहुत अच्छी कविता....

leena malhotra rao ने कहा…

अभिभूत हो गई पढ़ कर. निश्छल, सरल, निर्दोष, गृहणी का सुन्दर चित्रण और उतनी ही निश्छल अभिव्यक्ति. नमन.

sheshnath pandey ने कहा…

bahut achhi kavita hai.

sheshnath

reena ने कहा…

ek imaandar aur sahaj prem>>>>>>>>> bahut umda......

आशुतोष कुमार ने कहा…

क्षमा कीजिए , आज कल मेरा हर सुर बेसुरा ही लग रहा है . अगर स्त्री के घरेलूपन , पालतूपन , प्रश्नहीन समर्पण और प्रचंड मूर्खता को ही प्रेम कहते होंगे , तो यह जरूर एक ईमानदार प्रेम कविता है. !

सुन्दर-सृजक ने कहा…

नर-नारी के आदिम प्रवृतियों को समेटे उनके अंतरंग संबंधों की महीन डोर है,यह कविता, जिसके तंतुओं में एक पुरुष की निश्छल और पवित्र भावनाएँ गूँथी हुई है......प्रेमिकाओं के लिए लिखते-लिखते कवि अब ऊब-सा गया है जिसके कारण पत्नी के प्रति यह ताज़गी को समझा सकता है....हर हाल में एक अनुपम प्रेम कविता!

Maheshwari kaneri ने कहा…

ईमानदारी से लिखी सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति...
अभिव्यंजना में आप का स्वागत है.....

सुमन केशरी ने कहा…

प्रेम की सहज कविता...ईमानदार भावों से सम्पन्न...तुम्हारे प्रेम से ही हूँ इस लायक कि कर सकूँ प्रेम......यह बात आवेगी मन नहीं समझेगा, जो प्रेम को पताका की तरह फहराता चलता है....सुन्दर अभिव्यक्ति

वन्दना ने कहा…

निष्कपट भावों का सुन्दर समन्वय्।

गीता पंडित ने कहा…

लौट कर जब आता हूँ तुम्हारे पास
तुम में ही मिलती ही वह स्त्री
अचरज से भर उसके नाम से तुम्हें पुकारता हूँ


तुम विहंसती हो और कहती हो यह क्या नाम रखा तुमने मेरा.

आहा...
कितना निर्मल
कितना उज्जवल
कितना कोमल प्रेम तुम्हारा

मन के
हर द्वारे से प्रियतमा
मन ने तुमको आज निहारा ,
मैंने तुमको
आज पुकारा|
........ आपकी कविता पर मेरे मन के उदगार...

सस्नेह
गीता

रश्मि प्रभा... ने कहा…

बहुत कुछ देखते हुए भी नहीं देखती तुम
तुम्हारे सहेजने से है यह सहज

तुम्हारे प्रेम से ही हूँ इस लायक कि कर सकूँ प्रेम
ek garimamayi abhivyakti

मनोज पटेल ने कहा…

बहुत अच्छी कविता लगी अरुण जी, बिना किसी बनावट के, बिना आडम्बर के वो कहती हुई जो हमारे भीतर ही रह जाता है. आपसे ऎसी ही कविताओं की उम्मीद रहती है. बधाई...

विमलेश त्रिपाठी ने कहा…

अच्छी कविता। इमानदार आभिव्यक्ति। मेरी बहुत बधाइयां...

chetankavi ने कहा…

‎***********************************
"तुमसे पहले इस जीवन में, नीरस नीरस भाव रहे थे!
नहीं कहीं पर मरहम मिलता, और इस दिल में घाव रहे थे!
तुमने जीवन की बगिया को प्रेम के गंगाजल से सींचा,
तुमसे पहले इस जीवन में, पतझड़ के प्रभाव रहे थे!

तुम तो झरनों सी आकर्षक , फलीभूत वरदान बनी हो!
प्रेम बिना सब कुछ सूना है, ऐसा एक पैगाम बनी हो!

सुबह शाम और हर दिन अब तो, महके है घरवार हमारा!
कद शब्दों का छोटा लगता, कैसे दूँ आभार तुम्हारा!"

"आपकी जोड़ी युगों युगों तक सलामत रहे!-यही कामना है, यही प्रार्थना!- देव"

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बेजोड़ रचना...बधाई स्वीकारें

नीरज

डॉ.सोनरूपा ने कहा…

आपकी इस खूबसूरत रिश्ते की नर्मियों ने मेरे पिता की एक गजल की याद दिला दी ....

उसकी चूड़ी,उसकी बेंदी ,उसकी चूनर से अलग
मैं सफ़र में भी न हो पाया कभी घर से अलग

गो कि मेरी 'पास बुक 'से भी बड़े थे उसके ख़्वाब
फिर भी उसने पांव फैलाये न चादर से अलग

पत्रिकाएं उसके पढ़ने को मैं लाया था कई
फिर भी उसने कुछ न देखा मेरे स्वेटर से अलग ..डॉ.उर्मिलेश

khusi ने कहा…

acchi kavita hai.

mukti ने कहा…

अद्भुत !

निवेदिता ने कहा…

निश्छल अभिव्यक्ति .........

परितोष ने कहा…

बहुत अच्छी कविता है ,ईमानदार और नाज़ुक रिश्ते की इमानदारी को बांध कर सहेजने वाली कविता में इसकी गिनती होनी चाहिए .यहाँ कवी की एक ईमानदार कोशिस भी बार -बार दिखती है और दूसरी स्त्री की स्मृतियों में पहुँचने से उपजा अपराधबोध भी.यहाँ पुरुष अपनी कारगुजारियों को निश्चलता से मानता है और शरारत से उसे दाएँ-बाएं भी कर देता है ,कुल मिलकर ये पत्नी के निष्कपट प्रेम और पुरुष के एक ही समय में अनेक प्रेम के के रास्तो से गुजरते हुए अंतिम प्रेम तक पहुचने की कविता है,सुंदर अभिव्यक्ति और निर्दोष सहजता.हालाँकि की कुछ मित्रों को इसमें स्त्री को मुर्ख बनाने की लम्पट पुरुषवादी मानसिकता के शेड दिख सकते हैं लेकिन यही कहना होगा की वैचारिकता कॉपी बुक स्टाइल में न सिमटे बल्कि अधिक उदार और व्यावहारिक होकर जीवन को देखे तो उसकी प्रभावशीलता अधिक जीवंत और बेह्तर होगी .वैसे भी जल तो बहता ही अच्छा है ठहरा और सिमटा हुआ नहीं .बधाई

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

ऐसी कविता को लिखना हर किसी की बस की बात नहीं...ईमानदारी से अपनी भावनाओं को बड़ी सहजता से आपने कलम से उतार दिया है...पत्नी के प्रेम में डूब शिशु के प्रति जागृत होने वाली भावना की सम्भावना और पत्नी को किसी और के नाम से पुकार लेना- इन भावनाओं को दर्शाती कविता एक बहुत साहसिक लेखन इस लिए नहीं हो सकता क्यूंकि यह बहुत निश्छल कविता है..

आशुतोष कुमार ने कहा…

स्त्रियों को इस कविता में किन किन कारणों से प्रेम दीखता है , इस की गंभीर चर्चा वे ऊपर कर चुकीं हैं. लेकिन अहम् सवाल यह है कि इस कविता को स्त्रीत्व और स्त्री- प्रेम किन बातों में दीखता है .स्त्री के घरेलू जिम्मेदारियों के प्रति समर्पित होने में , बहुत कुछ देखते हुए भी न देखने में ,पति को अपराध बोध से मुक्त रखने में , उसे बाहर भीतर काम /प्रेम खोजने की फुर्सत मुहैया करने में. क्या यह वही आदर्श पत्नी नहीं है , जिस की कामना पुरुष ने पौराणिक काल से की है?क्या कविता इस स्त्रीत्व को प्रेम नहीं मान रही ?क्या कविता इस प्रेम को प्रश्नांकित कर रही है ? या गौरवान्वित कर रही है ?क्या राजनीति सहीपन को चुनौती देने का मतलब संस्कारबद्द पूर्वग्रहों को स्थापित करना होता है ?
ये बेहद गंभीर मुद्दे हैं. उठाये ही इस लिए जा रहे हैं कि अरुण देव हमारे अत्यंत संभावनाशील कवियों में से एक हैं. हम उन की कविता को गंभीरता से लेते हैं, इस लिए उस पर बात करते हैं. हिंदी में आह वाह का माहौल खत्म होना चाहिए . अकुंठ मन से गंभीर आलोचना और संवाद करने की संस्कृति का निर्माण करना भी हमारी ही जिम्मेदारी है.
इमानदारी और साहस बहुत अछ्छी चीजें हैं.लेकिन सब से जरूरी चीज है समझ.महत्वपूर्ण सवाल यह है कि प्रेम की हमारी अवधारणा क्या है . हम परम्परागत अवधारणा को चुनौती दे रहे हैं या मजबूती ? इस कविता में वाचक को किसी दूसरी स्त्री के प्रति आकर्षित हो जाने का अपराध बोध है . उसे यह अपराधबोध नहीं है कि उस के प्रेम में पत्नी को निर्धारित भूमिकाओं से मुक्त करने की इच्छा तक नहीं है.
किसी दूसरे या दूसरी से प्रेम करने में अपराध क्या है ? अपराध बोध की असली वजह यह अहसास है कि ऐसी भली और प्रेम मय पत्नी से असल में उसे कोई प्रेम नहीं है.और यह की उस दूसरी से भी उसे कोई प्रेम नहीं है. अगर कविता इस विन्दु तक आ सकी होती तो क्या बात थी. लेकिन इस के लिए उसे संदेह करना होता दाम्पत्य और प्रेम की समूची प्रचलित अवधारणा पर.लेकिन यहाँ संदेह नहीं और गाढा होता हुआ विश्वास है.
यह सब कहने के बाद भी मैं अपनी ही धारणा के प्रति संदेह की खिड़की खोल कर रखता हूँ.मुझे मेरी भूल गलती समझ में आयी तो उसे सुधार लेने में क्या गुरेज़ होगा ?

neera ने कहा…

इमानदार और सुंदर कविता...

ZEAL ने कहा…

लौट कर जब आता हूँ तुम्हारे पास
तुम में ही मिलती ही वह स्त्री
अचरज से भर उसके नाम से तुम्हें पुकारता हूँ

तुम विहंसती हो और कहती हो यह क्या नाम रखा तुमने मेरा....

I have never read such a beautiful and meaningful creation in my life.

Thanks and regards,

.

Sushil Krishna Gore ने कहा…

बहस लंबी चली। मुझे जो समझ में आ रहा है वह दो पंक्तियों में बता दूँ। अरुण ने ज़ाहिरा तौर पर यह कविता पत्नी के लिए ही लिखी है। इसका पाठ स्त्रीवादी व्याकरण से उलझ जाएगा। पत्नी की कविता कभी भी स्त्री की कविता कैसे हो सकती है। आज भी भारत की पत्नियों को फेमेनिज्म की बहुत जरूरत है।

उसकी संचित स्मृतियां ही हैं जो उससे न कहो, उससे न चाहो तो भी पुरुषों के पक्ष में जाती पुरानी वैचारिकी और स्थापनाओं को बार-बार धो-पोछ कर चमकाती रहती है। परितोष ने स्त्री की इस बद्धमूल स्थिति को बड़े ढंग से घुमाने की कोशिश की है जिससे लगे कि नहीं, इसके लिए व्यवस्था दोषी नहीं है। स्त्री खुद मूढ़ है। हम उसे व्रत करने से रोकते हैं लेकिन वह नहीं मानती। गाँव में तीज करती है राजधानी में करवा चौथ करती है।

इस कविता को पति-पत्नी के घरबार या किसी सामाजिक संवास के प्रचलित canons के सहारे नहीं समझा जा सकता। अरुण स्त्री अस्मिता को ही रेखांकित करते हैं। बहुतों ने इसीलिए उसे bold, सच्चा, जीवन जैसा ईमानदार, स्वीकारोक्ति वगैरह कहा भी है। है भी। लेकिन पत्नी को अंतिम प्रेम की शरणस्थली आदि के रूप में इस कविता का भाष्य कविता को नए-नए मुद्दों में फँसा देता है। अरुण की ईमानदारी मुझे भी स्वीकार्य है परंतु सिर्फ इसी सादगी पर मरना-मिटना भी ठीक नहीं है। स्त्री पत्नी के रूप में तो निभा ले गई अब उसे प्रेम का अंतिम अरण्य भी मत बनाइए। देह और देवी की वस्तुवाचक संज्ञाओं में स्त्री का संसार अब तक निस्सार रहा है - अरुण इसी उद्घोष के कवि हैं; प्रच्छन्न भी प्रत्यक्ष भी।
इस एकमात्र कविता पर लोगों की अपनी-अपनी एक पूरी पी.एच.डी. ही हो गई....कम कविताओं को इतना बड़ा public domain मिल पाता है .... और सामूहिक विवेक में प्रतिष्ठित होने का गौरव भी....

बधाई हो मित्रवर !!!

Ranjana Jaiswal ने कहा…

एक बोल्ड व इमानदार कविता |स्त्री को समझने का दावा करने वाला पुरुष भी उसके प्रेम को नहीं समझ पाता ,देव जी की कविता से कुछ उम्मीद बंधी है कि पुरुष प्रेम के जनतंत्र की और झुक रहा है .

त्रिपुरारि कुमार शर्मा ने कहा…

अरुण भाई... ऐसी रचनाओं पर दिल आ जाता है... इसे कहते हैं ईमानदार अभिव्यक्ति!बहुत प्यारी रचन...

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

इस कविता की इमानदारी पर कोई शक नहीं. लेकिन वह 'ईमानदारी' जो कह रही है उससे आपत्ति जरूर है. यह एक ऎसी कविता है जो स्त्री की परम घरेलू और लाचार छवि को पुरुष के ''प्रेम'' की प्राप्ति के लिए आवश्यक तत्व की तरह स्थापित करती है.यह सवाल कि 'पत्नी की कविता कभी भी स्त्री की कविता कैसे हो सकती है। '' मुझे अंदर तक हिला देता है ...क्या सारी उदात्ता बस बाहर की स्त्रियों के लिए? घर के खाली कनस्तर और बच्चे को जीवन के लिए अपना दूध पिलाती स्त्री से ऊब कर जिस बाहर वाली स्त्री के पास कवि जा रहा है उसके लिए ही है सारी आजादी और बराबरी? इस तरह की इमानदारियों के नाम पर स्त्री विमर्श का जो खेल हिन्दी में हुआ है उसने इस विमर्श को सर के बल खड़ा कर दिया है. बाक़ी आशुतोष भाई ने जो कहा है मैं उससे सहमत हूँ.

amitesh ने कहा…

कविता विमर्श के दायरे से बाहर भी हो सकती है...अक्सर कविता की आलोचना करते समय उसे अपने विचार की कसौटी पे कसना कहां तक जायज है? सुंदर और असुंदर के मूल्य निर्णय से परे क्या कविता की स्त्री हमारे समाज में मौजुद नहीं है..और अपनी लाचारी को वह भले ना महसूस कर पाती हओ या...अपने पति के छल और शोषण पर उसकी निगाह ना जाती हो, लेकिन कविता पढ़ते समय पाठक की निगाह अगर जाती है तो कविता की सफलता यहीं है.

अपर्णा मनोज ने कहा…

ये कविता न केवल ईमानदार कविता है वरन पुरुष और नारी के मनोविज्ञान को यथार्थ में जीती कविता है . एक वर्ग विशेष की conditioning को कहता सच है .इसमें कवि इस यथार्थ को स्वीकार करता है . कवि कुछ स्थापित करने का प्रयास नहीं कर रहा , वह एक परत को हटा रहा है और उसमें दबे सच को दिखा रहा है . इसमें नारी विमर्श भी नहीं है और न पुरुष की सामंती आँख का इशारा . न यहाँ कवि रूपक सजा रहा है और न बिम्बों में कविता को उलझा रहा है , वह एक भोगे यथार्थ की बात कहता है , जिसे इतनी आसानी से हम पचा नहीं पाते . दोहरे मान दंडों में जीता मनुष्य , यदि अपनी मानसिकता को सामने लाता है और अपनी मनोदशा से समानधर्मी लोगों के मन में प्रश्न पैदा करता है तो इसमें कविता स्त्री विरोधी नहीं हो जाती . क्या नारी का ये सच आम सच नहीं है . क्या स्त्री-पुरुष दोहरा जीवन नहीं जी रहे ? क्या दाम्पत्य में इस तरह की मनोवैज्ञानिक संभावनाएं नहीं रहती हैं ..
स्त्री बच्चों में जूझती है .. कनस्तर उसे आज भी परेशां करता है .. बच्चे की रिपोर्ट कार्ड वह बांचती है और उहापोह में जीवन बिताती है . उसका विहँसना केवल ignorance नहीं है .. न ही वह ब्लिस है . उसके विहँसने में छिपी त्रासदी का कवि उद्घोष नहीं कर रहा ... संकेत देकर वह एक स्थिति से , कविता से बाहर हो जाता है और शेष समाज पर छोड़ता है ...

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

शनिवार (१०-९-११) को आपकी कोई पोस्ट नयी-पुरानी हलचल पर है ...कृपया आमंत्रण स्वीकार करें ....और अपने अमूल्य विचार भी दें ..आभार.

Pradeep Saini ने कहा…

kavita par bahut sari tippaniyan hue hain.....lambi bahas hue....kisi ko lagta hai ki purush ke liye pyar ko dekhne ka dristikon naari se alag hai....phir bahas ne kuch aisi disha pakdi ki vah naari-purush mein bant gayi......ek sawaal ye bhi utha ki kya purush naari ke bhatkaav ko muaf/savikaar kar sakta hai ya nahin.......sawal rochak tha aur jawaab us se bh ijyada........kisi ne kaha ki metros mein purush streeyon ke aise kisi act ko savikar/muaf kar bhi sakte hain.......lekin bahar shayad aisa na ho.........mera mat hai ki hamare samaj mein stree purush sambandhon mein sabse mahatavpurn factor stree ki survival ke liye purush par dependence bhi hai......vah uske liye bread earner hai......use ek chat muhaiya karata hai......aur aurat aarthik taur se us par nirbhar hai......yah stithi naari se uske chun ne ka adhikaar cheen leti hai.....phir vah naari metro mein rahti ho ya door-daraj ke kisi gaon mein.......jab tak stree apne liye roti aur chat ka intjaam nahin kar sakti....tab tak uski sthiti purush se bheen hai aur rahegi......main ek baat aur jodna chahunga ki.....kaee baar stree aarthik taur par independent hote hue bhi purntay swantatr nahin ho pati....iske peeche bhi kaee samajik aur paravarik dawab rahte hain.....vakalat mein main kaee couples se mila hun.....unke matrimonial disputes/cases mein......maine paya ki streeyan bewafai karne mein purush se bahut jyada peeche nahin hain.....aur main aise purushon se bhi mila hun jo aise baton ke pramaan hone ke baad bhi use dooosra muaka dene ko taiyar ho jaaate hain....chaahe uske mool mein apne kiye ka pashchataap hi kyun na ho.....doosri baat jo main kahna chahunga woh ye ki is tarah ki bhranti nahin falai jani chahiye ki streeyan tyag ki murtiyan aur prem ki upaasak hain.....aur purush unka shoshak.....agar saari be-wafai purush kar rahe hain to yakinan ve aisa kisi doosri stree ke sath sambandh bana kar hi kar rahe honge....sawal udhta hai ki wah doosri stree kya kar rahi hai......aap use bhi victim bata kar palla nahin jhaad sakte .............aur kisi bhi insaan ki sachchai/moral values permanent nahin hoti.....chahe woh stree ho ya purush[ mujhe ye division karte hue achcha nahin lag raha hai] ...zindagi humme roz naye naye pralobhan deti hai....humme roz khud ko sambhalna shahejna hota hai........prem mein hone par bhi par stree ya par purush ki taraf aakarshan ho sakta hai.....lekin prem humme correct karta hai.....wah aapko khud ko samajhne ka mauka deta hai.....jab aap prem karte hain to apne bhitar cheepi vaasna ko jyada behtar tareeke se samajh sakte hain.....aur us se paar pa lete hain.....with due apology for such a long comment

Dr.Nidhi Tandon ने कहा…

सच्ची..सशक्त...रचना !!

Minakshi Pant ने कहा…

बहुत खूबसूरत रचना एक खूबसूरत सच्चाई को दर्शाती हुई जिसमे नारी के समर्पण की खुशबु है जो हर हाल में जीना जानती है सबके गुनाहों को अपने आँचल में छुपाने का खूबसूरत हुनर है उसके पास और फिर भी एक मुस्कुराता सा चेहरा जो बहुत सी वेदना के बाद भी उफ़ नहीं करता :)
बहुत खूबसूरत रचना |

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

नितान्त अलग भावभूमि पर सुन्दर कविता....

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

आद अरुण जी ,
आज अचानक आपके ब्लॉग पे आना हुआ .....
आपकी रचनाओं की जितनी भी तारीफ की जाये कम है ....

अगर आप क्षणिकायें भी लिखते हैं तो आपसे अनुरोध है अपनी कुछ (१०,१२) क्षणिकायें मुझे 'सरस्वती-सुमन' पत्रिका के लिए दें ..जो की क्षणिका विशेषांक निकल रहा है ....
यह अंक संग्रहणीय होगा ....
साथ में अपना संक्षिप्त परिचय और तस्वीर भी ....
इन्तजार रहेगा ....

harkirathaqeer@gmail.com

S.N SHUKLA ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकारें .


कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारने का कष्ट करें.

अरुण देव ने कहा…

डॉ अलका सिंह का एक आलेख इस पर यहाँ देखा जा सकता है
http://alka-singh.blogspot.com/2011/11/blog-post_3924.html

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

भाई अरुण जी यह एक अद्भुत कविता है बधाई

**अंजू** ने कहा…

प्रेम हमेशा सही या गलत भावनाओं के तराजू में तौला ही जा सके.. यह आवश्यक नहीं है .. सकारात्मक हो यह भी ज़रूरी नहीं ... यह कविता एक ईमानदार स्वीकारोक्ति है जो "not so perfect" से परिपूरित प्रेमभाव को दर्शाती है .. एक बेहद सच्ची और ईमानदार प्रेमपूर्ण कविता .. बहुत बहुत बधाई अरुण जी