बृहस्पतिवार, 20 अक्तूबर 2011

सिरहाने मीर के


















सिरहाने मीर के


लाल किले के परकोटे
और जामा मस्जिद की सीढियों से दूर
महबूब के दीवार के साए तले
टुक रोते रोते सो गया है  मीर
टूटे दिल और खुले चेहरे वाला वह शायर

जिसकी आवाज़  अब भी भग्न महलों में गूंजती रहती है
जिसमें हिंदुस्तान की दूर तक पसरी धरती का ताबाइं रंग है
जहां गौरया फुदकती है
मोर नाचते हैं
और आम रस से भरकर टपक जाते हैं

यह वही सूफी है जिसके विरह के ताप से टूट कर गिर पड़ी थी कभी पूरी की पूरी शताब्दी
इतिहास के बाहर जिसका मलबा आज भी पसरा है
जहां से  रह-रह  दुरार्नियों के लश्कर के लौटते घोड़ों के टापों की आवाज़े आती हैं
उजाड बस्तियों में दरवेश की तरह भटकती रहती है कोई पुकार 

हर ईंट की ज़बान पर दुःख भरा एक किस्सा है
क्या पता ..
समय का, सल्तनत का कि खुद शायर का 

कसका खींचे उसे कितनी ही बार देवालय में देखा गया था
काबे और कैलास का रास्ता
तब इतना जुदा नही दिखता
अगर कोई दिल के रास्ते चले
काबे का रास्ता कैलास से जा मिलता था

उसके शेरों ने अपनी नाजुक अंगुलिओं से जो सवाल उठाये
उसकी चोट से निरुत्तर हो जाते थे कई बार शेख ओ ब्रहम्न

जिस  कवि के लिए पेड़ के साए का बोझ भी कई बार असहय हो जाता 
उसकी ज़बान ने अपने लिए ऐसे शब्द चुने जो अब्र की तरह
अर्थ की बंजर धरती पर बरस जाते थे


वह भाषा जो सिंधु को पार करके खुद एक नदी थी
उस भाषा को भी क्या इल्म
कि कभी उसके भी दो हिस्से होंगे

अल्फाज़ कहीं
मायने कहीं और.












22 टिप्पणियाँ:

वंदना शुक्ला ने कहा…

lazawaab ..
उसकी ज़बान ने अपने लिए ऐसे शब्द चुने जो अब्र की तरह अर्थ की बंजर धरती पर बरस जाते थे
''meer dariya hai sune sher zubani uski,/allaah allah re tabeeyat kee ravani uski /ek hai ahd me apne vo parainda mizaj /apni ankhon me na aya koi sani uski/.....

राजेश चड्ढ़ा ने कहा…

बहुत बढ़िया.....मायने कहीं और....!

अनुपमा पाठक ने कहा…

अगर कोई दिल के रास्ते चले
काबे का रास्ता कैलास से जा मिलता था
सुन्दर!

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

bahut sundar .. shayar ko samjhen kee kavi ki kee lekhni ko.. kavita aur kathanak bahut sundar ..fir bhi aik kashak... saadar

ANJU SHARMA ने कहा…

बहुत सुंदर लिखा अरुणजी, लगा जैसे कुछ पल के लिए जी लिया उस वक़्त को जो गवाह था हमारी पुरानी दिल्ली की गंगा-जमुनी संस्कृति का, जहाँ देवालय और मस्जिद को एक ही शिद्दत से सजदा किया जाता था! इतिहास के पन्नों को पलटते हुए, मीर के जानिब से तारीख को देखना वाकई एक शानदार तजुर्बा रहा! वहीँ एक सल्तनत के वजूद के भग्नावशेषों को टटोलना भी एक अलग तरह का अहसास रहा, वाकई चलचित्र की भांति एक के बाद एक इतिहास के उस दौर को महसूस करके देखा, इसे कविता नहीं एक दस्तावेज कहना ज्यादा सुखद लगा मुझे, जिसमें न सिर्फ काव्य है, बल्कि जिज्ञासा है, करुना है, गौरव है और अंततः एक बृहद सोच है...............शानदार कविता के लिए बधाई.....

sushma 'आहुति' ने कहा…

बहुत ही खुबसूरत....

सुमन केशरी ने कहा…

वह भाषा जो सिंधु को पार करके खुद एक नदी थी
उस भाषा को भी क्या इल्म
कि कभी उसके भी दो हिस्से होंगे

अल्फाज़ कहीं
मायने कहीं और.

अपने एक बड़े कवि को इस तरह याद करना बहुत मानीखेज है...खासतौर पर आज के समय में यह रेखांकित करते हुए कि कसका खींचे उसे कितनी ही बार देवालय में देखा गया था
काबे और कैलास का रास्ता
तब इतना जुदा नही दिखता
अगर कोई दिल के रास्ते चले
काबे का रास्ता कैलास से जा मिलता था
बहुत सामयिक और मार्मिक कविता...बधाई और धन्यवाद...

सुशीला पुरी ने कहा…

'वह भाषा जो सिंधु को पार करके खुद एक नदी थी
उस भाषा को भी क्या इल्म
कि कभी उसके भी दो हिस्से होंगे'...!!!

वन्दना ने कहा…

क्या कहूँ निशब्द कर दिया……………मौन के गहरे सागर मे लाकर छोड दिया।

सुमन केशरी ने कहा…

वह भाषा जो सिंधु को पार करके खुद एक नदी थी
उस भाषा को भी क्या इल्म
कि कभी उसके भी दो हिस्से होंगे

अल्फाज़ कहीं
... मायने कहीं और. " अर्थ गर्भित और मार्मिक.... "कसका खींचे उसे कितनी ही बार देवालय में देखा गया था
काबे और कैलास का रास्ता
तब इतना जुदा नही दिखता
अगर कोई दिल के रास्ते चले
काबे का रास्ता कैलास से जा मिलता था"



बहुत ही मानीखेज पंक्तियाँ...आज के संदर्भ में तो और भी जब हमारी भावनाएं बहुत कोमल हो गईं हैं और संवेदनाएँ उसी अनुपात में भोंथरी...हम इतिहास को संकुचित समय और अर्थों में देखते हुए यह भूलजा रहे हैं कि इतिहास कुछ वर्षों और कुछ स्वार्थों के लिए नहीं होता और जो ऐसा कर रहे हैं वे बबूल ही बो रहे हैं आने वाली कई सदियों के लिए कई पीढ़ियों के लिए... इस कविता के लिए धन्यवाद अरुण

pradeep saini ने कहा…

एक कविता में कितनी ताकत हो सकती है .......वह कितना कुछ कह सकती है ........ इसे समझने के लिए यह कविता बेहतरीन उदाहरण है ......... शायर को याद करते करते क्या कुछ नहीं कह गयी कविता ........ और वह भी ऐसा कि जिसे आज बार बार कहने की जरूरत है ..........वह भाषा जो सिंधु को पार करके खुद एक नदी थी
उस भाषा को भी क्या इल्म
कि कभी उसके भी दो हिस्से होंगे

अल्फाज़ कहीं
मायने कहीं और.......उम्दा...........अरुण जी .....बधाई.

khusi ने कहा…

aapko padhkar mir yad aa gaye..................................Ishq hai tarz-o-taur ishq ke taeen,
Kahin banda kahin Khuda hai ishq.

nishtar ने कहा…

bahut hu umda

नवनीत पाण्डे ने कहा…

दिव्य दृष्टि...गहरी बातें

अपर्णा मनोज ने कहा…

सिरहाने मीर के .. कविता समय के साथ सीढ़ियाँ चढ़ती -उतरती है . भग्न इतिहास का वह दुःख आज भी ईंटों की जुबां पर है .. खंडहरों से हमारे भीतर चहल कदमी करता .. गहरे तक उतरता . सिरहाने मीर के आज का युग लेटा है .. आहत संवेदनाएं .. कौन सा तख़्त जिस पर इस ज़ख़्मी आर्यवर्त को घड़ी भर सुकून मिले . कविता सामयिक है .

"उसके शेरों ने अपनी नाजुक अंगुलिओं से जो सवाल उठाये
उसकी चोट से निरुत्तर हो जाते थे कई बार शेख ओ ब्रहम्न"

सवाल आज भी ज्यों के त्यों हैं .. कितना बदले हम .. ?


"वह भाषा जो सिंधु को पार करके खुद एक नदी थी
उस भाषा को भी क्या इल्म
कि कभी उसके भी दो हिस्से होंगे

अल्फाज़ कहीं
मायने कहीं और."


कविता पढ़कर विस्मित हूँ बस

Purushottam Agrawal ने कहा…

‎'उसी के फ़रोग-ए-हुस्न का झमके है सबमें नूर/ शमा-ए-हरम हो या कि दिया सोमनाथ का'
मीर की कविता के दर्द की मार्मिक अभिव्यक्ति की है तुम्हारी कविता ने, अरुण, बधाई...

leena malhotra ने कहा…

कविता प्राणवान हो उठी है.. . मेरे का दर्द हर शब्द में सम्प्र्षित होता है..जिस कवि के लिए पेड़ के साए का बोझ भी कई बार असहय हो जाता एक कवी ही समझ सकता है एक कवी के मन की बात.. आपने बखूबी कर दिखाया.. अनुपम कृति के लिए बधाई.. बहुत बधाई..

mridula pradhan ने कहा…

अल्फाज़ कहीं
मायने कहीं और.
wah......

Rizvanul Haque ने कहा…

अरुण देव जी की यह कविता उनकी पिछली कविताओं अमीर खुसरो, मिर्ज़ा ग़ालिब, बहादुर
शाह ज़फर के विस्तार के रूप में देखी जानी चाहिए, अभी हल ही में मीर की दो
सौ साला बरसी का जश्न ख़त्म हुआ है, इस दौरान उन्हें फिर से तलाश करने और
आज के ज़माने में उन की अहमियत को समझने की काफी कोशिशें की गईं ये कविता भी
उसी सिलसिले की एक कड़ी है. इस कविता में इन्सान होने और बन ने की कोशिश के
बहाने इंसानियत के मर्म को छूने की कोशिश की गई है, इस में तारिख से
डायलाग करने और आज के समय से उसे जोड़ने और आज के सन्दर्भ में उसकी
प्रासंगिकता का दिलचस्प बयानिया है बने बनाये ढांचों से अलग मीर को समझने
की एक अच्छी कोशिश. ऐसी कविताओ में अरुण देव की भाषा भी कल और आज में एक बहुत अच्छा समन्वय स्थापित करती है,
अरुण देव की मीर के इस शेर के साथ अरुण देव जी को बहुत बहुत मुबारक
मत सहल हमें जानो फिरता है फलक बरसों
तब खाक के परदे से इन्सान निकलते हैं

Pallavi ने कहा…

वाह अरुण जी ,आपकी एक रचना मैंने आज "वटव्रक्ष" पढ़ी जिस का नाम था "कुफ्र" बहुत अच्छी और अपनी सी लगी आपकी यह रचना ऐसा लगा जैसे आपने मेरे मन में उठे हुए सवालों को सामने लाकर रख दिया हो... वहाँ पढ़ी रचना का कमेंट यहाँ दे रही हूँ आगे भी आपकी रचनाएँ पढ़ती रहूँगी। समय मिले कभी आपको तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

Sunil Singh ने कहा…

कितना संवेदनशील !

डॉ.मीनाक्षी स्वामी ने कहा…

सशक्त कविता।
"पेड़ के साए का बोझ भी कई बार असहय हो जाता..."
"वह भाषा जो सिंधु को पार करके खुद एक नदी थी"
बहुत सुंदर.....। अद्भुत...प्रयोग।
भोथरी होती संवेदनाओं को एसी ही धारदार कविताओं की जरुरत है।