मधुमास
इतवार कब फिसल गया पता ही नहीं चला
थक कर लौटती हो तुम
टूट कर गिरा रहता हूँ मैं
कभी प्याली तुम पकड़ाती हो
कभी चाय मैं बनाता हूँ
हम दोनों मिलकर भी कई बार नहीं बना पाते रात का खाना
जाले कौन हटाए यह एक और उलझा हुआ सवाल है
गमले का पौधा पहले मुरझाया फिर रविवार आने से पहले ही
गिर कर सूख गया
उसका शव मिट्टी बना
इस मिट्टी में रोपना है फूल
करता हूँ इंतज़ार फिर किसी छुट्टी का
सूरज को देखे बरसों बीत गए
चाँद दिखता है धुंधला
किसी दिन जब हम आफिस जाने की जल्दी में थे
खिड़की से गौरया ने खटखटा कर दी थी आवाज़
हडबडी में हम छोड़ आए चलता पंखा
शाम उसके पंख बिखरे मिले घर में खून से लथपथ
अब हमारी खिड़की बंद रहती है
बसन्त
पहिओं से घिसटता हुआ आता है हमारे शहर में
तुम्हारी खुशबू में लिपटा चला आता है धुंआं
मेरे कपड़ों से रेत की तरह गिरते हैं
मेरे छोटे-बड़े समझौते
तुम्हारी लिपस्टिक से उतरती हैं दिन भर की फीकी मुस्कराहटे
तुम्हारा मोबाईल तुम्हारी हंसी को बदल देता है
यस सर में
मेरा लैपटाप खींच ले जाता है मुझे तुमसे दूर
अपनी आफिस टेबल पर
अगले दिन शाम ढले फिर तुम झुकी हुई आती हो
रात गए मैं बुझा सा तुमसे मिलता हूँ
हमारे बीच
न स्नेहिल स्पर्श है, न कातर चुम्बन. न आतुर रातें
शायद वीर्य और रज भी हमारी किश्तों के भेट चढ़ गए.

24 टिप्पणियाँ:
आपकी कवितायेँ हमारे समय का दस्तावेज हैं .... और यह कविता बड़ी बेबाकी से वह सच हमारे सामने रखती है जिसे हम रोज़मर्रा जीते हुए भी नज़रंदाज़ करते हैं .....क्या खूब पकड़ा है आपने कि ........................शायद वीर्य और रज भी हमारी किश्तों के भेट चढ़ गए.
दाम्पत्य की उलझने ऐसी ही हैं और कविता को उन उलझनों में ढूँढ लेना बड़ी बात है.. सुन्दर लगी कविता.. रेत की तरह गिरते समझौते..लिपस्टिक से उतरती मुस्कराहट नए बिम्ब .. सुन्दर..
कामकाजी युगलों की अंतर-वैयर्क्तिक समस्याओं के बेबाक चित्रण के साथ-साथ, जो बेहद उजला पक्ष झांकता है इस कविता में, वह है खीझ और हताशा की अनुपस्थिति. एक खास तरह की समझदारी, जो न हो तो 'संबंध' ही नहीं 'जीना' ही बोझ बन जाए. मैंने जानबूझ कर 'समझौता' नहीं समझदारी कहा है. उल्लेखनीय है कि ऐसी विकट स्थितियों में भी कविता का 'संभव' होना, कविता के भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है, खासकर तब जबकि कविता के अवसान की अहर्निश भविष्यवाणियां की जा रही हों. बधाई.
अगले दिन शाम ढले फिर तुम झुकी हुई आती हो
रात गए मैं बुझा सा तुमसे मिलता हूँ
zindagi kho si gai hai
सार्थक प्रस्तुति, आभार.
कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारें, अपनी प्रतिक्रया दें.
कविता केवल महानगर , दाम्पत्य और समकालीनता पर ही नहीं रूकती बल्कि , इससे आगे निकल गई है और पीछे मुड़कर भी देखती है ...
दाम्पत्य , विवाह , व्यस्तता , घुटन ... पहले भी कुछ युगल इसी तरह नीरसता महसूस करते रहे होंगे , वर्तमान सामने है और भविष्य में विवाह की संस्था कहाँ ले जायेगी ..
परिवारों में रिसता अवसाद , शिथिल होते सम्बन्ध .. कविता पीड़ा देती है . मार्मिक से आगे .. अवसाद की ओर ले जाती है . निराशा का जाल बुनती है और अनास्था के साथ वैयक्तिक संबंधों का कटु यथार्थ बयान करती है ..एक बोल्ड कविता है पर कचोटती हुई .
थक कर लौटती हो तुम
टूट कर गिरा रहता हूँ मैं
बहुत खूब अरुण जी! बहुत ही महीन संवेदनाओं को पकड़ा है...
"इतवार कब फिसल गया पता ही नहीं चला
थक कर लौटती हो तुम
टूट कर गिरा रहता हूँ मैं
कभी प्याली तुम पकड़ाती हो
कभी चाय मैं बनाता हूँ
हम दोनों मिलकर भी कई बार नहीं बना पाते रात का खाना
जाले कौन हटाए यह एक और उलझा हुआ सवाल है"
यह हिस्सा अपने आप में एक मुकम्मल कविता है...बेहतरीन...आगे क्या कहूं..आगे आप बेहतर जानते हैं..मुकुल सरल
बहुत ही बेहतरीन और प्रभावशाली रचना....
बसन्त
पहिओं से घिसटता हुआ आता है हमारे शहर में
तुम्हारी खुशबू में लिपटा चला आता है धुंआं
मेरे कपड़ों से रेत की तरह गिरते हैं
मेरे छोटे-बड़े समझौते...............महानगरों में कामकाजी दंपत्ति के संबंधों का सूक्ष्म ताना-बाना, उनकी व्यस्तता के चलते बढती दूरियां और ऊब, संबंधों में आती नीरसता को शब्दों में बखूबी ढाला है, बधाई अरुणजी.....
alag mijaj ki kavita hai. itni tej khusbu hai ki aadmi ka man baura jaye.............
वर्तमान विसंगतियों ने महानगरीय दाम्पत्य को भी एक कोल्ड कॉफी का प्याला सा बना दिया है..लेकिन गर्माहट है तभी तो कविता उपजी है !
मुझे यह कविता अच्छी लगी. इस समाज में रिश्तों के बीच से खत्म होती जा रही गर्माहट को सही तरीके से दर्ज करने वाली. बस लगा कि अंतिम पंक्ति कुछ और हो सकती थी...और अधिक मार्क..और मानीखेज...
बमाजरत.....पर आखिरी पंक्ति कविता के सौंदर्य को मद्धम कर रही हैं .....पंक्ति असरदार है पर शायद शब्दों का चुनाव नहीं .......शेष कविता बहुत ही असरदार है ..हर मध्यमवर्गीय परिवार के बहुत करीब से गुज़रते हुए .....बधाई .....
jiya aur bhoga hua yatharth jab kavita men apna shareer khojta hai to aisi hi kavitayen aakar paati hain..ek sheesha jismen har mahanagron ka kaamkaji joda apna chehra dekh le....good
टूटते हुए ...या ख़त्म होते हुए रिश्तों का दर्द समेटे ...महानगरों की अलबेली भाग-दौड़ के बीच अपना अधिपत्य जमाये हुए सजीव कविता है ..
तुम्हारी लिपस्टिक से उतरती हैं दिन भर की फीकी मुस्कराहटे
तुम्हारा मोबाईल तुम्हारी हंसी को बदल देता है
यस सर में...शानदार ..बधाई अरुण जी .
इस कविता में ऐसा कुछ है जो आपको बहुत देर तक हांट करता है ....... कविता पढ़ने के कई दिन बाद भी बार बार ये लगता है ..... कि पंखा चलता हुआ छोड़ आया हूँ.......जब घर वापिस पहुंचूंगा तो .......
"अंतर का हर वैभव पल-पल छूट रहा है,
समय लुटेरा जाने क्या-क्या लूट रहा है| "
... वो पल जो जीवन को परिभाषित करते हैं कहीं खो गये हैं...और रह गयी है केवल थकन, घुटन, अवसाद, पीड़ा ... और ऐसे ही क्षणों में मन को प्रश्रय देती रचना जो आपकी लेखनी से निकली...
क्या यही और ऐसे ही जीवन की चाह है या....मुझे लगता है यहाँ लाकर पाठक को छोडती है .. बधाई अरुण जी...
सस्नेह
गीता पंडित
एक नए तर्ज पर जीने लगे हैं लोग और समझ भी नहीं पाते तब तक जिन्दगी उनके हाथों से फिसल कर दूर चली जाती है ! इस सत्य को प्रभावशाली और गहरी संवेदना से प्रस्तुत किया है आपने !
यह मेरा अनुभव तो नही है, लेकिन इतना कहने का मन है कि आखिर इस शैथिल्य और अकर्मण्यता का कारण क्या हो सकता है ?
देव सर आपने रोज के जीवन को बड़ी जीवन्तता के व्यक्त किया है ! कई बार या की रोज ऐसा ही होता है जब मन सिथिल हो इस भाग दौड़ वाली जिंदगी से ! तब प्रिय से प्रिय या परम आत्मीय भी दूर जाता हुआ प्रतीत होता है , जैसे - "इतवार कब फिसल गया पता ही नहीं चला
थक कर लौटती हो तुम
टूट कर गिरा रहता हूँ मैं
कभी प्याली तुम पकड़ाती हो
कभी चाय मैं बनाता हूँ
हम दोनों मिलकर भी कई बार नहीं बना पाते रात का खाना
जाले कौन हटाए यह एक और उलझा हुआ सवाल है"
धन्यवाद हम सबको पढवाने के लिए !!!
कामकाजी दाम्पत्य जीवन की विवशताओं में खोती रिश्तों की संवेदनाएं, उष्मा के अलावा सबसे खास मानवीय भावनाएं.....
"खिड़की से गौरया ने खटखटा कर दी थी आवाज़
हडबडी में हम छोड़ आए चलता पंखा
शाम उसके पंख बिखरे मिले घर में खून से लथपथ
अब हमारी खिड़की बंद रहती है"
अब खिडकी के बंद रहने में हडबडाहट के बावजूद मानवीयता का बाकी रह जाना बहुत ही सकारात्मक संकेत देता है।
सूक्ष्म संवेदनाओं को बारीकी से उतारा है कविता में।
आपकी कविताएं देर तक और दूर तक सोचने को विवश कर देती हैं।
मीना त्रिवेदी बहुभाषी हैं. इधर हिंदी की समकालीन कविता का अनुवाद उन्होंने मराठी में करना शुरू किया है. मेरी एक कविता का भी अनुवाद हुआ है.
मीना के लिए आभार के साथ यह कविता मराठी भाषी सहृदय मित्रों के लिए.
मधुमास : अरुण देव
रविवार कसा निसटून जातो लक्षात च येत नाही
तू थकून येतेस
मी थकून कधी एकदा पडतो
कधी तू हातात कप देतेस
कधी मी चहा करतो
तर कधी आपण दोघे मिळून
रात्रीच्या जेवणाला मूक्तो
जल्मत कशी काढ्याची हे एक कोडे च असते.
नंतरच्या दिवशी तू आणिक थकून भागून येतेस
रात्री मी बुजलेला भेटतो तुला
कुंडितलावलेले रोप दुसर्या दिवशी कोमेजले
रविवार उजाडायच्या आधी
सुकून गळून गेले.
मातीत मिळाले .
ह्याच मातीत नवीन फुल रोप लावायचे
पुन्हा सुट्टी चे कधी जमते का बघायचे
उगवतीचा सूर्य बघून काळ लोटला
चंद्र आपला नेहमीच ढगाळ.
कधी ऑफिसच्या घाईत असताना
साळुंकी नि दार ठोठावले होते
गडबडीत पंखा ऑन ठेवून आपण निघून गेलो .
परतल्यावर रक्ताळलेले पंख पसरले घरभर..
आता ती खिडकी बंद च असते .
वसंत
आपल्या शहरात येतो चाकांच्या घर्घरातून
पाय फरफटत
तुझा सुगंध पांघरून
धुराचे वलय पसरते
माझ्या कपड्यातून
मी केलेल्या तडजोडी
वाळू सारख्या
सर सर सरत राहतात .
तुझ्या ओठांवरच्या
लिपस्टिक मधून ओघळते
उदास मंद हास्य ..
तुझा मोबायल बदलतो तुझे असे हसणे.
एस सर..
म्हणत लेप टोप ओढून
जातो तुज पासून दूर..
ऑफिसच्या टेबलावर
आपल्या मध्ये
हवासा स्पर्श,
बेहोष करणारे चुंबन,
हुरहुरणारी रात्र
हरवली आहेत
माझे शुक्राणू नि तुझी बीजे
इंस्ताल्मेंत वर शहीद झालेत
अनुवाद : मीना त्रिवेदी
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