सोमवार, 12 दिसम्बर 2011

हत्या

























हत्या

उसकी हत्या हुई थी. सड़क से गाँव के रास्ते का एक हिस्सा सुनसान था. खेतों से होकर गुजरता था. वही से वह गायब हुई. वही गन्ने के खेत के पीछे उसका शव मिला, कई दिनों बाद. चेहरा झुलसा हुआ. कपड़ो से पहचानी गई.

पिता ने ज़ोर देकर कहा कपड़ो से पता चलता है उसके साथ दुष्कर्म नहीं हुआ है. लड़की ने मरते मरते भी कुटुंब की लाज़ बचाई.

कहीं बाहर नौकरी करता भाई आया था. चेहरे पर थकान. जैसे किसी झंझट में पड़ गया हो.

घर के लोग अब जो हो गया सो गया का भाव लिए कुछ आगे करने के बारे में संशय में थे.     एक पड़ोसी ने यह भी कहा कि क्या जरूरत थी जवान लड़की को पढाने की.

वह सिपाही बनना चाहती थी. कोचिंग करने समीप के नगर में जाती थी. अन्त समय उसने मोबाईल से जिनसे बातें की वे भी उसके मौसरे भाई, चचेरे भाई थे. ऐसा उस लड़की की  जाति-बिरादरी के लोग कह रहे थे. बार-बार



अगर लड़की किसी के प्रेम में होती और तब उसकी हत्या होती तो इसे स्वाभाविक माना जाता, उसके इस स्वेछाचार का अन्त यही होना था, इसी किस्म से कुछ कहा जाता. और कुटुंब के लिए यह बदनामी की बात होती.

उसकी बस हत्या हुई थी. उसका किसी से प्रेम या शारीरिक सम्बन्ध नहीं था. यही राहत की बात थी.

एक लड़की जो स्त्रीत्व की ओर बढ़ रही थी
इसी के कारण मार दी गई

उसके लंबे घने काले केश जो इसी दुनिया के लिए थे

उसका चमकता चेहरा
जिसकी रौशनी में कोई न कोई अपना दिल जलाता

वह एक उम्मीद थी
उसे अपना भी जीवन देखना था

अगर वह प्रेम में होती, बिनब्याही माँ बनने वाली होती, उसके बहुत से प्रेमी होते
या वह एक बेवफा महबूब होती
तो क्या उसकी हत्या हो जानी चाहिए थी

क्या अब हम हत्या और हत्या में भी फर्क करेंगे.







17 टिप्पणियाँ:

अपर्णा मनोज ने कहा…

हिंदुस्तान के यथार्थ की कविता .. प्रश्न देती , व्याकुलता भरती
क्या अब हम हत्या और हत्या में भी फर्क करेंगे.
अरुण , सोच रही हूँ कि कविता के भीतर जो स्त्री है वह कहाँ -कहाँ मेरी स्त्री से साम्य रख रही है .. ये हत्या जीते रह कर भी होती है .. खुद स्त्री नहीं जान पाती . वह अपनी हत्या में जीवित रहते हुए न मातम मनाती है .. न कोई उसके इस शोक को जान पाता है ...
अपनी हत्या की रुदाली है वह .

ANJU SHARMA ने कहा…

अगर लड़की किसी के प्रेम में होती और तब उसकी हत्या होती तो इसे स्वाभाविक माना जाता, उसके इस स्वेछाचार का अन्त यही होना था, इसी किस्म से कुछ कहा जाता. और कुटुंब के लिए यह बदनामी की बात होती..............

उसकी बस हत्या हुई थी. उसका किसी से प्रेम या शारीरिक सम्बन्ध नहीं था. यही राहत की बात थी.............
कितना मार्मिक सत्य बयां किया है अरुणजी, हत्या के लिए केवल शरीर का अंत करना ही अनिवार्य शर्त नहीं है, हत्या भावनाओ, महत्वकांक्षाओ और प्रेम की भी होती है......."एक लड़की को एकमात्र महत्वकांक्षा होनी चाहिए बिरादरी में उसके पिता, भाई, चाचा, मामा का सदा सर ऊंचा रहे" वर्ना तैयार रहे ओनर किलिंग (होरर किलिंग) के लिए..........या जीते जी निहारती रहे अपने ही शव को.......

Ashish Pandey "Raj" ने कहा…

मेरी समझ से तो यहाँ रूपक है स्त्री कहो या मानवता जो तिल तिल कर मर रही है हम सबके भीतर रोज़ कहीं ...आभार अरुण जी !!

अनुपमा पाठक ने कहा…

हत्या हत्या में फर्क...! ओह....
समाज में खोखले इज्ज़त का दम भरने के कैसे कैसे प्रतिमान और इन सबके बीच दम तोड़ती स्त्री और उसके साथ सभ्यता की भी नष्ट होती साँसें... वस्तुतः इंसानियत की भावना क्रंदन कर रही है...
इस रुदन से भयावह कुछ नहीं!

khusi ने कहा…

naye mijag ki kavita hai. kya kahu ki aapki kavita me jindigi ke kayi rang hai.pareshan karti hai kavita

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति ने कहा…

अंतस में कई किस्म के उबाल लाती यह कहानी जहां हत्या और हत्या में फरक की महीन रेखाए किस तरह समाज खींच लेता है - जहां प्रेम एक गुनाह की तरह माना जाता है और उसका परिणाम हत्या भी हो सकता है, जिसको स्वाभाविक मान कर सहज स्वीकार कर लिया जाता है.. कितनी ही बातें इस लघुकथा में छुपी हैं .. बेहतरीन

विमलेश त्रिपाठी ने कहा…

उम्दा। कविता में कथा। कथा में कविता। मेरी हार्दिक बधाई....

Farid Khan ने कहा…

झकझोर देने वाली कविता। पढ़ने के काफ़ी देर बाद टिप्पणी कर पा रहा हूँ।

लड़की के माँ बाप लड़की को तो बचा नहीं पाते अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए तरह तरह तर्क गढ़ते रहते हैं।

कई परतों वाली मर्मस्पर्शी कविता।

मोहन श्रोत्रिय ने कहा…

जो अकथ है, उसकी व्यंजना बड़ी सघन है. समय और समाज पर अच्छी टिप्पणी भी है.

Pratiksha Ladha ने कहा…

sihara deti hai kabhi kabhi ye panktinya...

Aparna Sah ने कहा…

es hud tak ytharth per Arundevji ko naman..........Ladki se estree hone tak uske her umr ka ek tukra roz jibah hota hai.ye duniya phir us tukre ko der ke pheke ya nider hoker bhune,khaye aur sanso ki sharab pikar agle tukre ka intjar kare,use her khoon maf hai.ye jamane ki dastoor,sadiyo se chali aae hai,shayad sadiyon tak chale.....................​

Leena Malhotra Rao ने कहा…

अरुण जी ने हत्या में हत्या के फर्क का इतना अच्छा चित्रण किया है यह उन सब थोथी मानसिकता वाले लोगो पर कडा प्रहार है जो अपनी झूठी शान को एक जिंदगी से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं.. बहुत सुन्दर

Veena Bundela ने कहा…

kaleje me faans ki tarah chubh rahi hai ye hatya.,kyonki iski to justification bhi nahi hain.varna to roz hoti hain hatyayen. kabhi charitra ke nam par, to kabhi man pratishtha ke liye aur kahin ek patta tak nahi khadakta.bade aaram se sab sahmat ho jate hain ki vo mar diye jane layak hi thi..

Vipul Sharma ने कहा…

पिता ने ज़ोर देकर कहा कपड़ो से पता चलता है उसके साथ दुष्कर्म नहीं हुआ है. लड़की ने मरते मरते भी कुटुंब की लाज़ बचाई..... कितनी मार्मिक और विकृत सामजिक दृश्य..! एक पिता अपनी बेटी की हत्या पर शोक ना कर उसकी, माफ़ कीजिये... अपनी, अपने कुटुंब की लाज के बचने की दुहाई दे रहा है...जैसे कुटुंब की लाज बचने का जश्न मनाया जा रहा हो ! कितना मार्मिक!...... अरुणजी बहुत विचलित कर दिया...!

कल्पना पंत ने कहा…

अगर वह प्रेम में होती, बिनब्याही माँ बनने वाली होती, उसके बहुत से प्रेमी होते
या वह एक बेवफा महबूब होती
तो क्या उसकी हत्या हो जानी चाहिए थी

क्या अब हम हत्या और हत्या में भी फर्क करेंगे.

behad jarooree saval! jinke javab milane hee chahiye

डॉ.मीनाक्षी स्वामी ने कहा…

कुटुम्ब की झूठी लाज स्त्री के जीवन से कीमती मान ली गई है। यही आज भी हमारे समाज का सच है। बहुत ही मार्मिक, झकझोरने वाली कविता।

सतीश सक्सेना ने कहा…

उफ़ ...
हम जानवर .........