पेंटिग : साद कुरैशी
एकांत
पहाड़ों की वह हरे रंग वाली सुबह थीहिलता गाढ़ा रंग और उस पर चमकती हुई फिसलनघाटी में सूरज गेंद की तरह लुढक रहा थाघास के गुच्छे में उसकी किरणें उलझ जातींविराट मौन का उजाला फैल रहा था घाटी मेंइस मौन में आज उसे पता चला अपनी पदचापों कापलकों के गिरने की भी अपनी लय होती हैश्वासों के चढने का अपना संगीतअकेला होना असहाय होना नहीं होता हमेशायहीं से फूटती है अपनी लघुता को देखने की वह पगडंडीजिधर अब कोई कम ही निकलता हैउसकी देह तेजाब में भीगते – भीगते और तेज़ रौशनियों में जलते जलतेकुछ इस तरह हो गई थी किउसे जब तक जल में भिगोया न जाए वह अकडी रहतीजब उसने पुकारा जलएक शालीन धार अपनी शीतलता के साथ एक सोते सेफूट पड़ीजल के इस आगमन परउसने श्लोक की तरह कुछ उच्चरित कियाप्रार्थना के संबल से भर गईं उसकी आँखेंदेह ने अपने जल से जैसे इस जल का अभिषेक किया होइस निर्मलता के सामनेउसने अपने को कांपते हुए देखा.

22 टिप्पणियाँ:
अपनी लघुता को देखने की यह दृष्टि .. वाह कविता शानदार है..
अरुण की कविताओं को हमेशा कई बार पढने को मन करता है. कई बार समझने की इच्छा होती है और बार बार उसे कई लाइनों पर ठहर जाने को मज्बूर होना पडता है. यह कविता भी अपने अन्दर एक विराट को लेकर सामने आति है .इस मौन में आज उसे पता चला अपनी पदचापों का
पलकों के गिरने की भी अपनी लय होती है
श्वासों के चढने का अपना संगीत ..........................जल के इस आगमन पर
उसने श्लोक की तरह कुछ उच्चरित किया
प्रार्थना के संबल से भर गईं उसकी आँखें
देह ने अपने जल से जैसे इस जल का अभिषेक किया हो
इस कविता के भाव बेहद प्रभावी हैं . अंतर मन की सतह तक पहुंचने वाले भाव ............................. बहुत सुन्दर , गूढ और अर्थों से भर्पूर कविता के लिये बधाई.
निर्मलता देती हुई ...अद्भुत एहसासों से भरी ...बहुत सुंदर रचना ....
!आपकी कविता का लिंक नयी -पुरानी हल चल 04-02 -20 12 को यहाँ भी है
...नयी पुरानी हलचल में आज... .कृपया पधारें और अपने विचार दें
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बहुत ही सुंदर और मानीखेज अभिव्यक्ति, सच तो है अकेला होना हमेशा असहाय होना तो नहीं होता, अकेलेपन का साथ, निजत्व से पहचान, स्वत्व को पाने की कोशिश भला असहाय कैसे हो सकती है....कविता की अंतिम पंक्तियाँ सचमुच अर्थवान हैं और सुंदर भी......बहुत बहुत बधाई अरुणजी.....
एक कलाकृति की तरह , अपनेआप में प्रकृति होती , एक प्रार्थना , एक संबल , एक लय , एक ध्वनि , एक संगीत , एक पगडण्डी जिस पर चल कर मौन कैसे गुज़र गया ...
इस मौन में आज उसे पता चला अपनी पदचापों का
पलकों के गिरने की भी अपनी लय होती है
श्वासों के चढने का अपना संगीत
गहन अभिव्यक्ति ..स्वयं से मिलना बहुत अच्छा लगता है
कविता विचारतंत्र की जकड़ से मुक्त हो ज्ञानेंद्रियों के उत्सव में रची गई है जो किसी भी कवि के लिए और स्वयं कविता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है । इस उत्सव में ज्ञानेंद्रियों की रचनात्मकता ने सुंदर सुर सजाए हैं । इस उन्मुक्तता में कई बार जो वक्तव्य उभरते हैं वे इसीलिए भाते हैं कि गहरी इंद्रियबोध की प्रामाणिकता से पोषित हैं…
कर्ण सिंह चौहान
एकांत मे ही तो खुद को पाया जाता है………बेहद खूबसूरत भावो से सजी रचना।
इस मौन में आज उसे पता चला अपनी पदचापों का, पलकों के गिरने की भी अपनी लय होती है,
श्वासों के चढने का अपना संगीत.........
निःशब्द हो जाने का मन इस कविता को हुआ पढ़ते समय ... अरुण सर तो मेरे प्रेरणा स्त्रोत हैं .... अविस्मर्णीय ..
अकेला होना असहाय होना नहीं होता हमेशा
यहीं से फूटती है अपनी लघुता को देखने की वह पगडंडी
जिधर अब कोई कम ही निकलता है ..........
वाह ... बहुत ही बढि़या।
अरुण देव के पास कविता का ईमान और कारीगरी है। एंकांत की रचनात्मकता को लक्षित करना कवि का धर्म है। कविता में विचार जितना गहरे घंस कर आयें, उतना ही अच्छा। अरुण देव को यह पता है। बधाई।
बहुत ही खुबसूरत
और कोमल भावो की अभिवयक्ति...
अकेला होना असहाय होना नहीं होता हमेशा
यहीं से फूटती है अपनी लघुता को देखने की वह पगडंडी
जिधर अब कोई कम ही निकलता है.....
वाह अरुण भाई! बहुत ही गहन-गंभीर चिंतन की अनुभूति है..एक कोमल पर कटु यथार्थ
विराट से सूक्ष्म को सहजता पकडा है और बेहद प्रभावी रुप में प्रस्तुत किया है। अद्भुत अभिव्यक्ति।
अच्छी कविता । एकदम कसी हुई। अपनी सादगी में बहुत कुछ कहती हुई। हार्दिक बधाई...
अकेला होना असहाय होना नहीं होता हमेशा
यहीं से फूटती है अपनी लघुता को देखने की वह पगडंडी
जिधर अब कोई कम ही निकलता है
.......
वाकई ....बहुत बहुत बधाई अरुण जी !
▬● आपकी रचनाओं को मैंने हमेशा ही आकर्षक पाया है... शुभकामनायें...
दोस्त अगर समय मिले तो मेरी पोस्ट पर भ्रमन्तु हो जाइये...
● Meri Lekhani, Mere Vichar..
● http://jogendrasingh.blogspot.in/2012/02/blog-post_3902.html
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"अकेला होना असहाय होना नहीं होता हमेशा
यहीं से फूटती है अपनी लघुता को देखने की वह पगडंडी
जिधर अब कोई कम ही निकलता है."
यह कविता सही ढंग से समझी जाए इसके लिए जो "कुंजी" ज़रूरी है, उसे अरुण स्वयं उपलब्ध करा देते हैं, इन पंक्तियों में. अकेलापन और एकांत एक ही चीज़ के दो नाम नहीं हैं, यह कहना स्थापित सत्य का अनावश्यक पुनर्कथन होगा.एकांत की सृजनात्मक शक्ति, सामर्थ्य और संभावनाशीलता यहां खुलकर सामने आती है. कविता प्रस्तुति की कलात्मकता ने अर्थ को और सघन बना दिया है.
वाह!!!!!!!
जाने कैसे आज तक नज़र से दूर रहा आपका ब्लॉग...
बहुत बहुत सुन्दर लेखन..
अदभुद!!!!
सादर.
aapka jawab nahin
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