शनिवार, 4 फरवरी 2012

एकांत






















पेंटिग : साद कुरैशी 



एकांत


पहाड़ों की वह हरे रंग वाली सुबह थी
हिलता गाढ़ा रंग और उस पर चमकती हुई फिसलन
घाटी में सूरज गेंद की तरह लुढक रहा था
घास के गुच्छे में उसकी किरणें उलझ जातीं
विराट मौन का उजाला फैल रहा था घाटी में

इस मौन में आज उसे पता चला अपनी पदचापों का
पलकों के गिरने की भी अपनी लय होती है
श्वासों के चढने का अपना संगीत

अकेला होना असहाय होना नहीं होता हमेशा
यहीं से फूटती है अपनी लघुता को देखने की वह पगडंडी
जिधर अब कोई कम ही निकलता है 

उसकी देह तेजाब में भीगते – भीगते और तेज़ रौशनियों में जलते जलते
कुछ इस तरह हो गई थी कि
उसे जब तक जल में भिगोया न जाए वह अकडी रहती 

जब उसने पुकारा जल
एक शालीन धार अपनी शीतलता के साथ एक सोते से
फूट पड़ी

जल के इस आगमन पर
उसने श्लोक की तरह कुछ उच्चरित किया
प्रार्थना के संबल से भर गईं उसकी आँखें

देह ने अपने जल से जैसे इस जल का अभिषेक किया हो

इस निर्मलता के सामने
उसने अपने को कांपते हुए देखा.