पेंटिग : साद कुरैशी
एकांत
पहाड़ों की वह हरे रंग वाली सुबह थीहिलता गाढ़ा रंग और उस पर चमकती हुई फिसलनघाटी में सूरज गेंद की तरह लुढक रहा थाघास के गुच्छे में उसकी किरणें उलझ जातींविराट मौन का उजाला फैल रहा था घाटी मेंइस मौन में आज उसे पता चला अपनी पदचापों कापलकों के गिरने की भी अपनी लय होती हैश्वासों के चढने का अपना संगीतअकेला होना असहाय होना नहीं होता हमेशायहीं से फूटती है अपनी लघुता को देखने की वह पगडंडीजिधर अब कोई कम ही निकलता हैउसकी देह तेजाब में भीगते – भीगते और तेज़ रौशनियों में जलते जलतेकुछ इस तरह हो गई थी किउसे जब तक जल में भिगोया न जाए वह अकडी रहतीजब उसने पुकारा जलएक शालीन धार अपनी शीतलता के साथ एक सोते सेफूट पड़ीजल के इस आगमन परउसने श्लोक की तरह कुछ उच्चरित कियाप्रार्थना के संबल से भर गईं उसकी आँखेंदेह ने अपने जल से जैसे इस जल का अभिषेक किया होइस निर्मलता के सामनेउसने अपने को कांपते हुए देखा.
