अरुण देव की कविता : शहंशाह आलम



‘सूखे पत्तों में कोई
हरा पत्ता’
अरुण देव की कविताएँ
शहंशाह आलम






विता का आस्वाद अपना एक अलग महत्व रखता है. यहाँ एक सवाल यह खड़ा होता है कि क्या कविता कोई खाने-पीने की चीज़ है, जो इसमें ज़ायक़ा ज़रूरी है. खाने-पीने की चीज़ मुँह में पड़ने पर जीभ को जो स्वाद देती है, हम उस स्वाद का अनुभव करते हैं. कविता तो आँखों से पढ़े जाने वाली और कानों से सुनी जाने वाली शै है, फिर इसमें स्वाद का क्या लेना-देना है? स्वाद का लेना-देना यहाँ भी है.

कविता के साथ जब रस का मामला है, तो स्वाद का लेना-देना वाजिब है. भले कविता का आस्वाद हम अपने दिमाग़ की मार्फ़त महसूस करते हैं. मानिए न मानिए, रसहीन कविता स्वादहीन कविता होती है और रसहीन कविता काव्य के पूरे शास्त्र को प्रभावित करती है. काव्यशास्त्र हर शास्त्र से अच्छा शास्त्र माना गया है. और यह शास्त्र और अच्छा तभी रह सकता है, जब हम कविता को सही तरीक़े से बरतें. अब यह आप पर है कि इस शास्त्र को बरतते कैसे हैं या आप इस शास्त्र के साथ बरताव कैसा करते हैं. अगर आप यह सब नहीं मानते, तो आप कविता जैसी कोमल विधा के साथ पक्षपात करते हैं. अरुण देव जैसे कवि कविता के साथ पक्षपात करते नहीं देखे जाते.

अरुण देव की कविता को पढ़ते हुए मेरी यह धारणा हमेशा पुष्ट होती रही है कि कविता किसी की हो, अगर वह रसहीन है, तो किसी काम की नहीं है. अरुण देव एक रसदार कवि हैं. इनके यहाँ जीवन का रस भरा हुआ है और रस भी कैसा, जैसे कोई शहद का छत्ता मीठे रस से भरा होता है. जैसे कोई पेड़ मीठे आमों से लदा होता है. जैसे कोई दरिया मछलियों से लबालब होता है. इस कविता के इस रस के अच्छे होने का सबूत यह है कि आप जब अरुण देव की कविता पढ़ रहे होते हैं, तो इनकी कविता आपकी पीठ का बोझ नहीं बढ़ाती,

हवा भरो हवा भरो ट्यूब कहती है
चेन कहती है टाईट करो नहीं तो हम काँटों से फिसल जायेंगे

घंटी टन ठन कह रास्ता मांगती है
ब्रेक दुरुस्त रखो
जहाँ जरूरी हो लग जाएँ

हैंडिल मुड़ जाये कलाइयों की तरह
सीट हो मुलायम

खड़-खड़ मतलब
तेल चुआवो ग्रीस लगाओ

सड़कों पर आज भी सबसे सुंदर सवारी है सायकिल 

इसमें ईधन आदमी का जलता है
धुंवा श्वासों का निकलता है

पीठ पर बस्ते लादे स्कूल को दौड़तीं हैं सायकिलें
कतार में खड़ी इंतजार करती हैं चुपचाप छुट्टी की घंटी का  

वक्त पर इस पर ताज़ी सब्जियां थैले में लदी चली आती हैं
अभी अभी पिसा आटा टीन के कनस्तर में पीछे बैठा
गर्माहट देता हुआ चला आया है

बेवक्त इस पर लद जाते हैं दो जने और

एक पैर पर तिरछे हो सुस्ताती हुई सायकिल की मुद्रा
बड़ी मोहक है.

अरुण देव की हर कविता का अपना एक पवित्र तापमान होता है, अपना एक पवित्र मौसम होता है, अपना एक पवित्र संगीत होता है. ऐसा होने के पीछे की वजह यह है कि अरुण देव एक पवित्र आत्मा के पवित्र कवि हैं. इनकी कविता की पवित्रता की यह लज़्ज़त आप भी महसूस सकते हैं अगर आप सायकिल चलाते रहे हैं या अगर आप कुम्हार का चाक चलाते रहे हैं या अगर आप लोहार का घन चलाते रहे हैं.

अरुण देव
१६ फरवरी १९७२, कुशीनगर
उच्च शिक्षा जे.एन.यू. नई दिल्ली से

कवि और आलोचक
क्या तो समय’,  कविता संग्रह भारतीय ज्ञानपीठ से २००४ में और कोई तो जगह हो, कविता संग्रह राजकमल प्रकाशन से २०१३ में प्रकाशित.

कोई तो जगह होके लिए २०१३ का राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रीय सम्मान

नेपाली, मराठी, बांग्ला, असमिया, कन्नड़, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में कविताओं के अनुवाद और कुछ लेख प्रकाशित

9 वर्षों से हिंदी की चर्चित वेब पत्रिका ‘समालोचन’ का संपादन
www.samalochan.com

आम तौर पर हर कवि एक कुशल चित्रकार होता है. वह जो-जो कुछ देखता है, वही हमको दिखाता है, अपने कविता-बिंबों के माध्यम से. ये बिंब-चित्र अनोखे-अद्वितीय होते हैं. अरुण देव वैसे ही कवि हैं यानी एक उत्कृष्ट चित्रकार कवि हैं. इनकी अधिकतर कविता को कोई चित्रकार अपनी चित्रकारी का विषय बना सकता है. अपने आसपास की घटनाओं से प्रभावित होकर जिस तरह कोई चित्रकार कोई चित्र बनाता है, ठीक वैसे ही अरुण देव किसी चित्रकार के मनमाफ़िक़ अपनी कविता रचते रहे हैं. अब घड़ा को ही लीजिए न, घड़ा पर सहस्र चित्र बने होंगे, मगर सहस्र कविताएँ नहीं लिखी गई होंगी. अरुण देव की घड़ा शीर्षक कविता इस पानी कम हो रहे समय को ताज़ा पानी से भरती है,

घड़ा पानी में भर देता है अपना स्वाद
गर्मियों में खींच कर उसकी तपिश

कुम्हार मिट्टी को चाक पर तराश कर बनाता है उसे
आग तपा कर उसे मज़बूत करती है
जल को वह इस तरह धारण करे कि
उसके महीन रंध्रों से होकर आती रहे हवा 
जल डोलता रहे
हिलता रहे
और बना रहे मृदु

कुंभ जल को कैद नहीं करता कि दम घुट जाए
जल न तपता है
न पड़ जाता है शव की तरह ठंडा

करोड़ो वर्ष पूर्व की अपनी स्मृतियों के साथ
जैसे खुद वह एक जीवन हो 
उसकी बूंदों से ही बनी हैं कोशिकाएं

फूट कर तन के कुम्भ का जल भले ही जल में समा जाता हो

टूट कर घड़ा फिर जी उठता है
जल के लिए.


सच ही तो है, जिस दुनिया में हम रह रहे हैं, उस दुनिया से रोज़ कितना पानी कम हो रहा है. आज पानी के बग़ैर कितने लोगबाग जीने को मजबूर हैं, यह किसी से छुपा हुआ नहीं है. या फिर, आगे आने वाले दिनों में और कितने-कितने लोगबाग पानी के बिना रहेंगे, इस बात का हिसाब आसानी से लगाया जा सकता है. अरुण देव को मालूम है कि पानी है, तभी घड़ा है. सच यह भी है, जिस दिन पानी नहीं होगा, उस दिन हम शव की तरह ठंडे ही तो पड़े मिलेंगे किसी सूखे तालाब में. घड़ा को ज़िंदा रखने के लिए ज़रूरी है पानी को ज़िंदा रखना. और यह बचाए रखने का काम सामूहिक काम है. आज अपने भारत को देखिए, तो भारत में कई जगहें ऐसी हैं, जहाँ से पानी ग़ायब हो रहा है और यह पीड़ा की बात है कि जहाँ पानी अधिक है, वहाँ उसका दोहन भी अधिक हो रहा है. अरुण देव घड़े की विरासत को बचाए रखने के बहाने पानी की विरासत को बचाना चाहते हैं. हर घड़ा पानी का मौन गीत गाता जो रहता है.

कविता का एक अर्थ यह भी है कि यह साधना चाहती है, साधन नहीं. बहुत सारे कवि आज कविता का साधन की तरह उपयोग कर रहे हैं. साधना में संघर्ष जो है. बहुत सारे कवि इसी वास्ते साधना की बजाय साधन से काम चला लेते हैं. जबकि कविता का साधनात्मक उद्देश्य ज़रूरी है. अरुण देव का कविता के साथ बरताव साधना से भरा है. यही वजह है, अरुण देव की कविता आदमी के निकट की कविता है. और आदमी का जीवन ऐसा है कि बिना संघर्ष किए उसका एक क़दम आगे बढ़ाना मुश्किल होता जा रहा. आदमी के इस संघर्ष को अपनी कविता में अरुण देव अस्वीकार नहीं करते. सवाल यह भी खड़ा किया जा सकता है कि संघर्ष है क्या बला ? यह वही है न, जो सूखे पत्तों के बीच एक हरा पत्ता हमेशा बचा रहता है. संघर्ष का आयतन इतना-सा ही तो होता है आदमी के जीवन में, मगर इस आयतन को सबके लिए समझना कितना कठिन है. आदमी अपने इस आयतन में रहते हुए अपने संघर्ष से यानी भूख से, बेरोज़गारी से, नाकामी से, परेशानी से थोड़ी-बहुत रियायत चाहता भी है, तो उसको यह रियायत नहीं दी जाती,

एक बड़ा पर्दा है काला
उसमें छोटे छोटे छेद हैं रौशनी फूट रही है

चला जाता एक लम्बा जुलूस है शोक में डूबा
एक बच्चा पीछे मुड़ मुड़ कर देखता है

घनी रात है
आकाश डूबा हुआ अपने ही अँधेरे में
एक दिया जलने बुझने की संधि पर टिमटिमाता हुआ अपनी ही जिद पर अडा
जलता हुआ

कोई छोर नहीं बाढ़ अबकी उतर आयी है मैदानों में
पेड़ के फुनगी पर एक मेमना
एक बच्चा पिता के कंधे पर बैठा है रखे अपने सिर पर पोटली
एक डोलती बड़ी सी टोकरी में
एक मुर्गी अपने सात आठ चूजों के साथ

शव गृह से अपने बच्चे का शव कंधे पर ले सीढियाँ उतरता पिता
थका जैसे कंधे टूट रहें हों उस फूल के भार से
उसकी एक ऊँगली पकड़े आँखे पोछती उसकी बेटी

नुकीले शीत में खेत की रखवाली करते मजूर ने टीन का दरवाज़ा बंद कर लिया है
पैरों के पास थोड़ी सी आग बची है

दंगे में जलते घर से निकल भागी जा रही वह लड़की
उसके हाथ में दराती है
वह हवा को चीरती हुई निकल गयी है

युवा ने राजधानी में जगह तलाश ली है रहने के लिए
पर जहाँ सूरज नहीं पहुंच पाता
उसे मिल ही गया है कुछ पन्नों के अनुवाद का काम

क्या तुम्हारी पराजय बड़ी है इनसे.

अरुण देव की कविता के शब्द हमको यही तो समझाना चाहते हैं कि आदमी के पास कुछ वर्ष पहले तक एक विनम्र राजा चुनने का हथियार उसका वोट हुआ करता था. आज की तारीख़ में वह भी उससे छीन लिया गया है. अरुण देव यही महसूसते हैं. मेरी बात लें, तो मुझे यह बात समझ में नहीं आती कि मेरा हर तानाशाह राजा के ख़िलाफ़ दिया वोट जाता किस अदृश्य दुनिया को है? इसमें कोई शक नहीं कि एक ऐसी दुनिया ज़रूर बनाई जा रही है, जिस दुनिया में रहने वालों को मेरे जैसों के वोट के ग़ायब कर दिए जाने के बारे में सबकुछ मालूम है. तभी तो मेरे जैसा आम आदमी हारता अपने भारत में है और मेरे जैसों के हारने की जीत विदेशों में मौज मार रहे भारतीय मनाते रहे हैं. यानी वोट की छीना-झपटी में माहिर और विशेषज्ञ भी, दक्ष भी, अच्छे जानकार लोगों का भी निर्णय यही रहता है कि वे विदेशों में मौज करते रहें और हम यहाँ पकौड़े बेच-बेचकर अपना जीवन नष्ट करते रहें. इससे सिद्ध यही होता है कि आम आदमी को अपना जीवन बेहतर बनाने के जो भी उपाय या विकल्प हैं, वे भी हड़प लिए जा रहे हैं. अरुण देव की कविता इस घातक प्रवृत्ति का विरोध करती है.

अरुण देव के इस अच्छे काम का बदला आप इनकी कविता का साथ देकर कर सकते हैं. अरुण देव जैसे कवि की ख़ासियत यही है कि यह कवि आदमी के संघर्ष का मौन समर्थन न करके खुलकर यानी टाल ठोकना जिसको कहते हैं न, वही टाल ठोककर करते हैं. यह ख़बर मेरे जैसे साधारण आदमी के लिए अच्छी ख़बर है. अकसर कविता ख़बर ही तो लेती आई है ज़ालिम बादशाहों की,

उनके पास गालियाँ हैं अतीत के लिए
महापुरुषों के लिए अपशब्द

उनके एक हाथ में छेनी है एक में हथौड़ा
वे घूम घूम  ध्वंस कर रहें आदमकद मूर्तियाँ

वे किताबों को जला रहें हैं
चित्रों को फाड़ रहें हैं
आज़ाद आवाज़ों को दबा रहें हैं
कर रहें हैं शब्दों की निगरानी

नष्ट कर रहें हैं संग्रहालयों को
भ्रष्ट संस्थाओं को
शब्दों के मायने बदल रहें हैं

उन्हें एक ही रंग पसंद है
एक ही राग
एक जैसे कद और पहनावा एक जैसा


वे अब बाहर निकल आयें हैं
संक्रमित कर तैयार कर रहें हैं अपनी प्रतिकृतियाँ
भविष्य के मुहाने पर उनका जमावड़ा है


नदी के वेगवती होने का यही समय है.

 _____________
कवि शहंशाह आलम  के पांच कविता संग्रह प्रकाशित हैं, और वह चित्र भी बनाते हैं.

पता : हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड,
पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक,
फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार

मोबाइल :  09835417537

ई-मेल : shahanshahalam01@gmail.com

6/Post a Comment/Comments

कैसी लगी आपको कविताएँ

  1. साइकिल पर कविता साइकिल से प्रेम कर सकने वाला ही लिख सकता है। इस कविता का मज़ा ले सकने की भी एक आवश्यक शर्त साइकिल से प्रेम करना है।

    जवाब देंहटाएं
  2. आलम जी आपने ख़ूब शिद्दत से लिखा है। अरुण जी को पढ़ना भी एक सफ़र की तरह है।

    जवाब देंहटाएं
  3. नीरज मिश्रा26 मई 2019 को 8:59 pm

    बेहतरीन कविताओं को इतनी बेहतरीन और सूक्ष्म दृष्टि से कोई कवि आलोचक ही देख सकता है।बहुत बधाई आपको अरुण जी और शहंशाह आलम जी को।����

    जवाब देंहटाएं
  4. आप सबकी टिप्पणियों के लिए आभार।
    ■ शहंशाह आलम

    जवाब देंहटाएं
  5. नरेश गोस्वामी27 मई 2019 को 10:52 am

    मुझे अरुण के कवि एक बड़ी ख़ासियत यह लगती है कि उनकी कविताएँ हाथ नचा-नचा कर बात नहीं करती। उनमें विद्रूप और विरूपित को खोज लाने या लक्षित कर लेने का ग़ुरूर नहीं है। बहुत से अच्छे कवि भी वंचना, शोषण, बहिष्करण और दमन के बिम्ब रचते हुए इस अहमन्यता से ग्रस्त नज़र आते हैं कि देखो, मैं क्या विरल और अनूठा प्रस्तुत कर रहा/रही हूँ।
    इसके धुर उलट, अरुण जीवन के दारूण और बेचैन कर देने वाले यथार्थ पर बहुत विनयपूर्वक उंगली रखते हैं। वे अपनी भंगिमा से चौंकाना नहीं चाहते― न कथन में, न अदायगी में। ऐसा लगता है कि जैसे वे कविता को घटित होते देखते हैं।
    मेरे ख़याल में यह अध्यात्म का दृष्टा-भाव या चीज़ों को निस्संग होकर देखने का भाव नहीं हैं। अरुण जीवन और प्रकृति के विरुद्ध साज़िश करती स्थितियों, प्रक्रियाओं और शक्तियों को बग़ैर बीच में आए दर्ज करते हैं। शायद यही वजह है कि उनकी कविता का कथ्य हम तक सीधे पहुँचता है।
    कवि का केवल माध्यम बन जाना, पाठक की आँख बन जाना एक असाधारण बात है।
    शहंशाह आलम की यह टिप्पणी इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि इसमें हम अरुण की कविताओं के प्रोटोप्लाज्म बिना माइक्रोस्कोप के देख सकते हैं।

    जवाब देंहटाएं
  6. नरेश गोस्वामी जी की टिप्पणी बेहद काम की है। शुक्रिया।
    ■ शहंशाह आलम

    जवाब देंहटाएं

टिप्पणी पोस्ट करें

कैसी लगी आपको कविताएँ