उत्तर पैग़म्बर : अरुण देव





"कौतुकपूर्ण सृजन का अतिरेक आपको उन्मत्त कर सकता हैलेकिन सामूहिक चेतना में जो कुछ भी छिपा रहता है उसे केवल अनछुए सच का इलाका ही बाहर निकालता है. यह केवल सृजन का विवेक ही है जो इस अनछुए को चमकाता है. सुप्रसिद्ध अवधी कवि मालिक मुहम्मद जायसी पर लिखी अरुण देव की कविता इसी तरह आपको बाँध लेती है.

अवधी कविता के इस महाचितेरे कवि जायसी की स्मृतियों को कवि नाना अर्थ छवियों से टहोकता चलता है और जायसी की काव्यात्मक शख्सियत से जुड़े अनुत्तरित सवालों की तरफ हमारा ध्यान खींचता है. कवि ऐसा मानता है कि जायसी के काव्य-कौशल ने उसे इतना काबिल बना दिया था कि वह जीवन के आध्यात्मिक पक्ष और कामनाओं के बीच लय स्थापित कर पा रहा था. उसकी कविता ने उन सब नामुबारक तकलीफ़ों को उधेड़ कर रख दिया था जो उसकी कुरूपता के कारण उसके हिस्से आयी थीं. यह उसकी कविता की ताकत ही थी जिसने मज़ाक उड़ाती भीड़ के बीच भी उसे लोकप्रिय बना दिया था.
‘सोलहवीं शताब्दी के सूफ़ी कवि जायसी के कुरूप पर हँसने वाले
उनको सुन कर रोने लगते थे
उनकी कविता रक्त और आँसुओं से लिखी गयी थी’

अपनी कविताओं “चाहत”, “रफ़ी के लिए” और “विज्ञापन और औरत” में अरुण देव समकालीन जीवन के तमाम घुमाव-पेचोख़म को एक साथ पकड़ने की कोशिश करते हैं. नरेटर चिर-परिचित यथार्थ से जूझते हुए उससे परे जाना चाहता हैजिसे रोज़ बदलते सामाजिक मूल्यों ने जकड़ रखा है. व्यवसायीकरण ने हमारे मूल्यों को हड़प लिया है और एक भयवाह सुखाभास ने अच्छा ख़ासा अँधेरा हमारे चारों तरफ फैला दिया है. 

अरुण देव ऊबाऊ किस्म के लम्बे विवरणों से बचते हैं और उस संवेदनशीलता का ध्रुवीकरण करते चलते हैं जो दम घोंटू नहीं है. कविताओं में कवि विषयासक्ति  की चकाचौंध और निरी भावुकता से बचता चलता है. वह हाज़िर जवाब है. स्थिर उबाऊ टेकों के लिए उसके यहाँ कोई जगह नहीं. उसकी कविताएँ चाक्षुष बोध की कविताएँ हैं. विश्लेषी बोध की नहीं. ये कविताएँ हमें यथार्थ से रूबरू कराती चलती हैं और इनमें किसी भी तरह की भावोत्तेजना का घोल नहीं. उनकी तीखी व्यंजनाएँ आत्म-दया में तिरोहित नहीं होतीं और उनकी बहुत –सी कविताएँ प्रेम-बोध की कविताएँ हैं जिनमें शनै: शनै: प्रेम का स्वर धीमा होता जाता है और मूलभाव उभर कर सामने आता है. अरुण देव की कविताएँ मानव मन की थाह लेती हैं और अपनी व्यंजनाओं में जीवन की विषमताओं को पचाती चलती हैं. उनके लिए कविता ही एकमात्र साधन है जो हमें मुक्त करती है."


शफी किदवई (द हिन्दू)

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